झुलसता तन-मन

 

ओह! "दो बूँद तेल की पड़ते ही कैसे हाथ में छाला पड़ गया...." बहुत ही दर्द हो रहा है....  रुको, दीदी, मैं, बर्फ लगा देती हूँ. पूजा ने अपनी बहन, नेहा से कहा. बर्फ  लगाने के बावजूद भी दर्द कम नहीं हो रहा. देखो, कैसे मॉटे मॉटे फफोले पड़ गए हैं. नेहा जलन के कारण कराह रही थी.

कैसे सहा होगा उसने? कितनी पीड़ा, कितनी जलन... ओह! सोच कर ही रोंगटे खड़े हो गए है. नेहा अपने छालों को देख कर बोली.
कौन दीदी? किसकी बात कर रही हो?पूजा, नेहा के उदास चेहरे को देख कर बोली.

वो... "स्वर्णा"... नाम के अनुरूप स्वर्ण देह, बड़ी-बड़ी हिरणी-सी आंखे, गुलाबी होठ और लम्बे काले बाल, स्वभाव से नम्र, मधुरभाषी और दिल की साफ़ ....

मन की बातों को अपने शब्दों के माध्यम से पाठकों तक पहुंचाना उसकी सबसे बड़ी खूबी है...

दीदी कहीं आप उस '"स्वर्णा" की बात तो नहीं कर रही, जो "आज की बात" नामक समाचार पत्र की लेखिका है ... लेकिन वो तो ....? पूजा के चेहरे के भावों को पढ़कर नेहा ने कहा ... हाँ, वही स्वर्णा ...और मैं उसकी वकील.

स्वर्णा ने अपने लेखन कार्य में बहुत ही प्रतिष्ठा हासिल कर ली. पाठक गण, रोज़, समाचार पत्र में उसके लेखन की प्रतीक्षा करते. उसके शब्दों में जादू था... जो, पाठकों के सीधा दिल तक पहुँचता था. यहाँ तक की पढ़ने वाले उसे अपने करीब मानते, उससे अपनी समस्यांए बताते और वो बिना किसी लातलपेट के अपने शब्दों के सृजन से उन्हें मानसिक अवसाद से बाहर निकालती और उन्हें सकारात्मकता का रास्ता दिखाती. आज के टेक्नोलॉजी युग में भी लोग उसके लेखन के कारण ही समाचार पत्र खरीदते.

यहां तक सम्पादक जी भी उसकी प्रशंसा करते नहीं थकते और उपहार में उसे रहने को घर, गाड़ी और अच्छे वेतन से उसका मान सम्मान किया, जिसकी वो हकदार थी. उसके कई फैन फोल्लोविंग थे, जिनकी केवल एक ही इच्छा थी की एक बार ही सही, स्वर्णा का फोटो उसके लेखन के साथ प्रकाशित हो जाये, जिसे स्वर्णा काफी समय से टाल रही थी.

स्वर्णा ने पिछले पांच सालों में अपनी एक पहचान बना ली थी.. और इस बार उसने अपनी फोटो छपने की स्वीकृति दे दी.

आज स्वर्णा बहुत खुश थी. माथे पर कुमकुम, आँखों में कजरा, बालों में गजरा, कानों में कुंदन और माथे पर सिन्दूर की लालिमा... जैसे सूरज की हजार किरणे उसके चेहरे की आभा को शोभित कर रही हो.

तभी वो ज़ोर से चीखी ... पल भर में स्वर्णा का चेहरा जल कर राख हो गया ... उसके शोर को सुन आस पड़ोस के लोगों ने उसे तुरंत हॉस्पिटल पहुँचाया. लगभग तीन दिन बाद उसे होश आया... अब भी, उसका तन और मन झुलस रहा था. उसकी माँ ज़ोर ज़ोर से डॉक्टर के आगे, हाथ जोड़ कर उसके लिए मौत मांग रही थी ... हाँ, पूजा तुमने सही सुना.

तभी स्वर्णा ने अपनी माँ को बोला माँ ... कमज़ोर मैं नहीं, आप सब हो.... आप मुझे इस हालत में नहीं देख सकते. आपको मुझसे ज़्यादा दर्द और तकलीफ होगी, इसलिए एक माँ होकर बेटी के लिए मौत मांग रही हो.

नहीं, माँ, मैं,आज भी अपने से प्यार करती हूँ और तन से ना सही ... मन से तो मैं सबकी फेवरेट ही रहूंगी. और स्वर्णा की माँ रोते हुए उसके गले लग जाती है. स्वर्णा दर्द में भी मुस्कुरा रही थी.

ऐसे कठोर समय में भी आशावादी और सकारात्मक विचार ... फैन तो मैं पहले से थी उसकी लेकिन अब मैं और इज़्ज़त करने लगी.

हाय! स्वर्णा, मैं नेहा, तुम्हारी वकील.... और इंस्पेक्टर, तुम्हारा ब्यान लेना चाहते है... मेने हाथ आगे बढ़ाते हुए कहा..
मुझे इन्साफ दिला सकोगी ... मेरे ही पति को सजा दिलवा पाओगी... बुरी तरह चेहरा झुलस जाने पर भी आत्मविश्वास की आभा से उसका चेहरा दमक रहा था...

केस कोर्ट में चला और उसके पति को दोषी ठहरा सात साल की कैद और कुछ जुरमेराशि तय की गई...

मैंने जज साहेब से माफ़ी मांगते हुए कहा, सर, स्वर्णा कुछ कहना चाहती है, क्या उसे आज्ञा है?

जज साहेब, मैं आपके फैसले से सहमत नहीं हूँ.स्वर्णा ने कहा.
"एक इंसान जिसे मैं दिल से प्यार करती, जिसके लिए अपनी खुशियों का चिराग जला कर, उसका घर रौशन किया और उसी ने मेरे सपनो को जला दिया ... उसके लिए सिर्फ इतनी ही सज़ा ...

नहीं सर, नहीं ... उसे तो ... गुस्से  में बोतल का सारा द्रव्य (Liquid) अपने पति के चेहरे पर फेंक दिया. कोर्ट में हलचल मच गई. सुगंधा का पति डर के मारे कांपने लगा...  सॉरी जज साहेब...  ये एसिड नहीं, हल्का  गर्म पानी है...  मैं तो सिर्फ, अपने पति के डर में अपना प्रतिबिम्ब देखना चाह रही थी जो उस दिन मैंने झुलसा...

स्वर्णा ने अपने पति की और देखा और कहने लगी, "क्या कीमत अदा करूँ, तेरे दिए तोहफे की...
तूने जिस्म जला कर मेरा,मेरी रूह का श्रृंगार किया है..."

तुम मुझसे जीत ना सके, तो हराने के लिए, मुझे ही जला दिया...और आज अपनी हार का शोर तुमने सरे आम मचा रहे हो.

जज साहेब, मैं नहीं चाहती की मेरे पति को सात साल जेल में गुजारना पड़े .... स्वर्णा की बात सुन सभी आश्चर्यचकित हो गए...

सर, मैं, चाहती हूँ की, मेरा पति मेरे साथ रहे ताकि उम्र भर वो मेरा झुलसता चेहरा देख सके. मैं चाहती हूँ की वो रोज़ मेरा श्रृंगार करे. मेरी जले हुए माथे पर कुमकुम लगाए, बिन बालों के गजरा सजाये, आँखों में कजरा लगाए ... रोज़ मेरी खूबसूरती निहारे ... मेरे छालों पर मलहम लगाएं ..    मेरी झुलसी हुई चमड़ी और उसमे से निकले मवाद से, बनाये हुए खाने का स्वाद चखे ... घर में चारों तरफ आइना हो और हर तरफ मेरा ही अक्स हो..

जज साहेब, मैं तो एक बार ही  झुलसी हूँ, लेकिन मुझे रोज़ इस तरह देखकर अब इसकी आत्मा झुलसेगी...

जज साहेब ने आज तक ना तो ऐसी सजा सुनी और ना ही सुनाई. सभी ने ऐसी अनोखी सजा की तारीफ की. स्वर्णा के संघर्ष, उसकी हिम्मत और उसके जज़्बे की सबने तालियां बजाकर तारीफ़ की.

दीदी, ये देखो आज का अखबार ... पूजा की बात सुन नेहा अतीत से वर्तमान में आई .

"हालात वो ना रखें,
जो हौसलों को बदल दें।
बल्कि
हौसला वो रखो जो,
जो हालातों को बदल दे।"

इन्ही पंक्तियों के साथ स्वर्णा की प्यारी सी फोटो, अखबार में छपी थी. आज भी उसके पाठक गण, उसकी 'तन की खूबसूरती से ज़्यादा उसकी मन की खूबसूरती' का सम्मान कर रहे थे...


तारीख: 12.09.2020                                                        मंजरी शर्मा






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