कहानियाँ

"मुझे कहानियाँ हमेशा से प्रिय रही हैं।

नानी सुनाती "राजा रानी और परियों" की कहानियाँ...

बाबा सुनाते गाँव-घर के इतिहास की कहानियाँ...

माँ सुनाती कभी अपने बचपन तो कभी शादी के बाद भी ख़ुद के अल्हड़पन, शरारतों की कहानियाँ...

इन सब कहानियों के बीच मैं कैसे और कब किसी की कहानी का हिस्सा होती चली गयी मुझे पता भी नहीं चला, जैसे साँझ ढलने और रात होने के बीच चन्द्र की उँगली थाम तारिकाएँ कब आकाश पर छा जाती हैं, हमें भान भी नहीं होता। ठीक उसी तरह कोई कब मेरी कहानी के मुख्य पात्रों में उतर, मेरी जीवन-कहानी का एक अभिन्न अंग हो गया, मैं यह जान भी नहीं पायी।

कुछ कहानियाँ किताबों के परस्पर चलती हैं-जैसे सुख के परस्पर दुःख और जीवन के परस्पर मृत्यु चलती है।।"

 

"तुम घूम फिर के मृत्यु पर ही क्यों आ जाती हो??"

"क्योंकि, मेरी कहानी का अंतिम पात्र मृत्यु ही है और उसके बिना मेरी कहानी पूरी ही नहीं होगी!!"

"मुझे लगा तुम्हारी कहानी का मुख्य पात्र मैं हूँ!!"

"मैंने कब मृत्यु को मुख्य पात्र कहा?... हर कहानी में एक पात्र ऐसा होता है, जो मुख्य तो नहीं होता, पर मुख्य से कम भी नहीं होता, जो कहानी की उँगली थाम उसे उसकी इति तक ले जाता है... और तुम तो मेरे देह की वो अदृश्य शक्ति हो, जो मुझे चलायमान रखे हुए है, तुम्हारा पास न हो कर भी साथ होना प्रेम का एक अप्रतिम उदाहरण है, जो मेरी कहानी को सदैव सुंदर और उत्कृष्ट बनाये रहेगा, मेरे ना होने के बाद भी!!"

"तुम दार्शनिक होती जा रही हो!!"

"मैं दार्शनिक नहीं हो रही, बस कहानी के अंत की ओर बढ़ रही हूँ, बहुत तेज़ी से!!"

"तुम्हारी बातें मुझे डराती हैं!!"

"और मुझे तुम्हारी आँखों में ये शंका के काले बादल डराते हैं। तुम जानते हो तुम मेरा सम्बल हो, तुम मेरी कहानी के वाक्यांशों का पर्याय हो, शब्दों का समुच्चय हो, तुम्हारी बातें मेरी कहानी का सबसे सुंदर संवाद हैं, जिनमें मैंने ईश्वर के श्रीवचनों की झलक पायी है। तुम्हारा होना मेरे संसार की परिधि को वृहत्‌ करता है, जिसके ऊपर प्रेम की करोड़ों आकाशगंगाएँ यूँ झिलमिलाती हैं... मानो, ईश्वर के विराट-स्वरूप का ज्योतिपुंज उनसे छिटक कर संसार को और दैदीप्यमान कर गया हो......क्या देख रहे हो ऐसे??"

"देख रहा हूँ... इतने से समय में तुम कितनी बदल गयी हो, प्रेम की सारी परिभाषाएँ तुम्हारे प्रेम की समझ के आगे बौनी सी हो गई हैं!!"

"ये सारा प्रेम तुमसे ही उद्गत होता है और प्रेम की एक नन्ही सी कली बन हर बार मेरे हृदय के कोने में प्रस्फुटित हो जाता है। मैं जितना चाहती हूँ कि, मैं स्वयं को एक दायरे में, एक परिधि में बाँध सकूँ, तुम्हारा प्रेम मेरे अस्तित्व को उतना ही विस्तृत कर देता है!!"

"तुम्हारी कहानी का मृत्यु से इतर अंत कुछ और नहीं हो सकता??"

"किसी की भी कहानी का अंत मृत्यु से इतर कुछ भी नहीं हो सकता!!"

"तुम जटिल होती जा रही हो!!"

"नहीं, मैं अब और सरल हो गयी हूँ, स्वयं के लिए, तुम्हारे लिए भी...किंतु तुम मुझे समझने की कोशिश कर रहे हो, इसलिए जटिल हूँ तुम्हारे लिए!!"

"तो क्या करूँ? मैं तो तुम्हे छोड़ नहीं सकता और तुम्हे पा भी नहीं सकता!!"

"तुम तो कब का मुझे पा लिये हो....देखो! आँखों के कोरों पर हमेशा रहती हूँ, पलकों पर दिए चुम्बनों में अंकित हूँ मैं, तुम्हारे होंठों के गुलाबी रंगत में एक हस्ताक्षर की तरह हूँ, तुम्हारे हृदय के विराट आँगन में तुम्हारे पसंदीदा गीतों पर थिरकती रहती हूँ, तुम्हारी बातों की खनक में, तुम्हारी हँसी की चमक में, हर कहीं तो हूँ मैं तुममें...और तुम्ही तो चिढ़ाते हुए कहते हो कि, छोड़ूँ कैसे मैंने अभी पकड़ा ही कहाँ है!... तो तुमने मुझे कभी ख़ुद में, अपने प्रेम को बन्धन बना बाँधा ही नहीं, तो मुझे छोड़ने का प्रश्न ही कहाँ उठता है....तुम मेरे देह के खाली पात्र में भरे अमृत की तरह हो, जो मुझे सदैव चैतन्य और जीवंत रखता है और मेरे जाने के बाद भी मुझे इन कहानियों, कविताओं, तुम्हारी हर आने वाली बात, दिन-रात और भविष्य की आँख में जीवंत और प्राणवान्‌ रखेगा!!"

"मुझसे प्रेम कर के तुमने कुछ तो नहीं पाया या फिर तुम्हारी और मेरी सुख की परिभाषाओं में धरती-आकाश का अंतर है!!"

"तुमसे प्रेम कर के मैंने प्रेम पाया है और प्रेम की गर्भ में सारे मनोभाव किसी गर्भस्थ शिशु की तरह रहते हैं, जो समय के साथ किशोर, वयस्क और प्रौढ़ होते हैं....किंतु इन भावों की प्रौढ़ता उम्र के बढ़ने का पर्याय नहीं। अपितु, साथी में इष्ट को पाने का एक मार्ग है!!"

"कभी-कभी लगता है मैं तुम्हें जानता ही नहीं हूँ...तो कभी-कभी लगता है मुझसे अच्छा कोई नहीं जान सकता....कभी-कभी तुमसे, तुम्हारे प्रेम से ईर्ष्या होती है!!"

"और मुझे विश्वास है कि तुम मुझे मुझसे अधिक जानते हो, तुम जानते हो कि मेरा प्रेम तुम्हे नाम-बेनाम के बन्धन में नहीं बाँध सकता, जिस तरह मैं स्वयं को किसी बन्धन में नहीं बाँध सकती। जिस तरह चिड़िया पिंजरों के लिए नहीं बनी, उसी तरह मैं किसी बन्धन के लिए नहीं बनी और तुम्हारा प्रेम अनन्त आकाश है... जिसका एक सिरा कहीं तुमने अपनी अनामिका उंगली में बाँध रखा है, तभी तो मैं हर बार तुम्हारी बाँह थामे लौट आती हूँ क्षितिज को छू कर, तभी तो मैं तुमसे खोयी नहीं या मैंने तुम्हें नहीं खोया!!"

"अच्छा, बातें बहुत हो गईं लोग बोर हो जाएँगे, जब कभी लोग इसे पढ़ेंगे तो!!"

"ये बातें, लोगों की ही तो बातें हैं, जो वो शायद कभी करना चाहते हों या कभी किसी से की भी हों। मैंने तो बस उन्हें शब्दों की शॉल से ढक दिया है, ताकि संसार की सर्द-मिजाज़ी उन्हें जमा न दें, मैंने सहेज लिया उन्हें संवादों के रूप में। यदि कोई पढ़ेगा इसे तो उसे अपनी अधूरी कहानी को पूरा करने का जी कर उठेगा और शायद यह हेतु बन जाये किसी की कहानी को पूर्ण करने के लिए!!"

"तुम दार्शनिक के साथ दूरदर्शी भी होती जा रही!!"

"नहीं मैं दूरदर्शी नहीं होना चाहती, मैं नहीं देखना चाहती भविष्य या होने वाली कोई घटना, मैं आज में, तुममें जीना चाहती हूँ, जब तक मृत्यु मेरे द्वार याचक बन के नहीं आ जाती!!"

"तुम वचन दो मृत्यु की बातें आज के बाद कभी नहीं करोगी!!"

"ठीक है वचन रहा, नहीं करूँगी, तुम्हारा आदेश कभी टाला है....अब क्या देख रहे हो??"

एक लंबी ख़ामोशी........

"देख रहा हूँ प्रेम यदि बोलता तो ऐसे ही बोलता...(मेरी ओर देखते हुए)....अब तुम क्या सोच रही??"

"सोच रही कुछ संवाद शायद कभी पूरे नहीं होते, वो अंतरिक्ष में मौन-ध्वनि बन विचरते रहते हैं, जब तक उन्हें पूर्ण करनेवाला नहीं मिल जाता और ये क्रम अनवरत चलता रहता है!!"

"अब चलता हूँ, शाम को माँ को डॉक्टर के पास ले कर जाना है। तुम्हें बहुत याद करती हैं....आज भी हमारे बीच के समीकरणों को समझने में उलझ सी जाती हैं!!"

"माँ को प्रणाम कहना और कहना कुछ बातों को ज्यों का त्यों छोड़ देना चाहिए। माँ से कहो, अच्छी, सुंदर, टिकाऊ कन्या खोजें तुम्हारे लिए!!"

"हाहाहा, ये मज़ाक था?"

"था तो!!"

"बहुत बुरा था!!"

 

प्रेम में मुझे बाँहों में भरा, माथे पर आज मिलने और एक लम्बे संवाद के अर्द्धविराम की घोषणा की मुहर रखी और बिना मुड़े दूर निकल गया। मैं खड़ी तब तक देखती रही जब तक वो क्षितिज के दरवाज़े से होते एक नई दुनिया में गुम नहीं हो गया। 

उसके जाते हुए कदमों के छाप को अपनी आँखों में समेटना यूँ होता है... जैसे विष के घूँट भी लगाने हैं और आह भी निकालनी है। किंतु, जाना हर बार आने का बीजारोपण कर के जाता है।।

 

शायद हम कोई कहानी नहीं लिखते। अपितु, समय स्वयं पात्रों का चुनाव कर, उन्हें यथास्थान पर बिठा, एक कहानी का प्लॉट लिखता है, जिस पर हम शतरंज के मोहरों की तरह चलते रहते हैं और कहानी अपने-आप पूरी होती रहती है।

 

यहाँ हर कोई किसी ना किसी को लिख ही रहा है, कोई ना कोई किसी न किसी को अपने जीवन की कहानी में पात्र की तरह ढाल रहा है, जो वो मौखिक नहीं कह पाता उसे समय घटनाओं में ढाल कर उस दूसरे व्यक्ति तक पहुँचा ही देता है।

 

हर व्यक्ति अपने आप में एक कहानी, एक अधूरी फिर भी पूर्ण कहानी है।।


तारीख: 03.10.2020                                                        नेहा वत्स






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