माँ का दिल

 

एक दो दिन से, वो लड़की रोज़ ही दिखाई देने लगी है. बिखरे गंदे बाल, ठिठुरती ठण्ड में भी फ़टे पुराने, मुश्किल से तन को ढकते हुए चीथड़े.... लगभग 15-16 वर्ष की, आँखों में मासूमियत लिए मेरी और देख रही थी. लोग इसे "पगली" कहते है. उसके चरित्र को दोष देने वाले ही उसके बदन को झांकते हुए दिखाई दे रहे हैं. कुछ समय बाद, मैं अपने घर से एक गर्म शाल और कुछ खाने का सामान उसे दे आई, मैंने उसे शाल उड़ाई और खाने को कहा... वे बड़ी बेचारगी नज़रों से कभी खाने को तो कभी मुझे देख रही थी, शायद थोड़ा डर भी रही थी. लेकिन, मेरी इक मुस्कान को देख वो सहज हो जल्दी जल्दी खाने लगी...  ये कहना गलत ना होगा की काफी समय से भूखी थी वो.

खैर, जब भी मैं उस रास्ते से गुजरती, तो कुछ ना कुछ खाने का सामान ले जाती. ऐसा लगता उसकी नज़रे भी मेरा इंतज़ार कर रही हो. लेकिन पिछले तीन दिन से मुझे वो दिखाई ना दी, मुझे भी कुछ खालीपन सा महसूस हो रहा था. मैं निराश सी वापिस घर आ गई.

आज सुबह-सुबह मंदिर से दर्शन कर वापिस लौट रही थी, तो देखा सामने कुछ भीड़ लगी है और काफी शोर सुनाई दे रहा है. पास जा कर देखा तो लोग, मारो-मारो चिल्ला रहे थे. आखिर माजरा क्या है? मेने एक आदमी से पूछा; तो उसने बताया, की एक पगली लड़की रोज़ मंदिर से दूध चुरा कर ले जाती है. कुछ लोग तो बोल रहे थे, की दूध ही क्या... मंदिर में चढ़ने वाला चढ़ावा भी क्या पता चुरा लेती हो? पता नहीं, पगली है भी या पागल होने का ढोंग रचा रही है? किसी ने कहा.. अरे, ये तो हमें ही पागल बना रही है. लोग उस पर आरोप प्रत्यारोप लगा रहे थे और उसे मारते जा रहे थे.

"पगली" नाम सुन मैं ठिठक पड़ी.भीड़ को चीरते हुए मैं आगे बड़ी तो देखा ये शाल ओढे ये वही लड़की है. एक आदमी बोला... इसकी शाल हटा के देखो, 'जाने क्या-क्या चोरी का सामान अपने में छिपाये बैठी है?

जब उसकी शाल हटाई, तो देखा उसकी गोद में एक छोटा-सा कुत्ते का पिल्ला था, जिसके पैर में चोट लगी थी और उस पर कपडे से पट्टी बंधी थी जो उसके चीथड़ों में से था और साथ ही दूसरे हाथ में दूध की थैली थी. कुत्ते के पिल्लै को उसने बच्चे की तरह अपनी छाती से लगाया हुआ था.

वो "पगली" सच में पागल थी, आखिर उसके सीने में माँ का दिल जो धड़क रहा था.


तारीख: 21.07.2020                                                        मंजरी शर्मा






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