मेरी सरल- सरला बहु

 

विमला जी की बहु सरला, स्वभाव से सरल नम्र और दिल की साफ़. अभी लगभग दो महीने पहले ही उसका विवाह हुआ है. घर और घर के सदस्यों दोनों के मन में वो रच-बस गई है. सभी उसके घर की कार्य कुशलता और सभी के प्रति प्रेम और मान सम्मान की तारीफ़ करते हैं.

वैसे तो विमला जी का भी स्वभाव अच्छा है, लेकिन वो जिस प्रकार अपनी बात को अप्रत्याक्षित रूप से सरला को कहती है, भोली सरला समझ नहीं पाती.

विवाह के बाद सभी रिश्तेदारों के घर से खाने का निमंत्रण लगा हुआ था. वैसे तो पूरा परिवार ही खाने पर जाता था, लेकिन इस बार सरला की बड़ीबहन के घर केवल सरला और उसका पति ही गए. सरला की बहन ने सरला के लिए बहुत ही सुन्दर सोने के कंगन और उसके पति और बाकी घर वालों के लिए बहुत सारे उपहार भेजे. घर आकर सरला ने सारे उपहार अपनी सास विमला जी को दिखाए और बच्चों की तरह खुश होते हुए अपने हाथ में पहने हुए सोने के कंगन दिखाए.

विमला जी ने मुंह बनाते हुए कहा-"बहु मायके का ज़्यादा गुणगान अच्छा नहीं है." सरला को कुछ समझ नहीं आया, उसने सोचते हुए 'हाँ' में सर हिलाया.

कुछ समय बाद हरियाली तीज का त्यौहार आया. सरला हरी साड़ीं में बहुत ही सुन्दर लग रही थी. सरला सोलह श्रृंगार कर, हाथ में हरी हरी चूड़ियां पहन कर, सासु माँ के पैर छू, आशीर्वाद लेने लगी, तो विमला जी ने सरला को टोकते हुए हुए कहा - बहु, नई दुल्हन, लाल रंग की चूड़ियां पहनती है. सरला ने हामी भर हरी चूड़ियों को उतारकर लाल रंग की चूड़ियां पहन ली.

तीज के बाद सरला, रक्षाबंधन के लिए अपने मायके गई. सरला के भाई ने उसे उपहार स्वरूप सोने के झुमके दिए. सरला ने वो झुमके पहन लिए. अगले दिन ससुराल पहुंची तो, सरला की सास और नन्द वहीँ मौजूद थी. दोनों ने सरला के सोने के झुमके देखे लेकिन कहा कुछ नहीं.

अगले दिन सरला ने अपने झुमके उतारकर छोटे टॉप्स पहन लिए, जिसे देख सरला की नन्द मुंह बनाते हुए बोली, भाभी तो अपने मायकी की चीज़े छुपा लेती है, उन्हें तो लगता है कहीं मैं उनसे  झुमके मांग ना लूँ, इसलिए तुरंत अपने झुमके चेंज कर लिए.

नन्द की बात सुनकर, सरला ने बड़े भोलेपन से अपनी सास के सामने कहा, दीदी, सासु माँ ने ही मना किया था की अपने मायके की चीज़ों का दिखावा नहीं करना चाहिए, इसलिए मैंने आप सभी को झुमके नहीं दिखाए. और क्योंकि झुमके काफी बड़े थे इसलिए मैंने उन्हें चेंज कर लिया.

ऐसे ही विमला जी, सरला को, हर बात को सीधे-स्पष्ट ना कहती जिससे सरला ठीक से समझ ना पाती. एक बार श्राद्ध के भोजन की तैयारी में सरला ने देसी घी का हलवा बनाया जिस पर उसकी सास ने ताना मारते हुए कहा, की पंडितों के लिए देसी घी का हलवा ... ऐसे तो तुम सारा घर लुटा दोगी.

कुछ समय बाद उसके ससुर जी का जन्मदिन था जिस पर विमला जी ने सरला से कहा की तुम्हारे ससुर जी को हलवा बहुत पसंद है तो सुबह हलवा बना देना और साथ ही पहली थाली पंडित जी के लिए भी निकाल देना. सरला ने सुबह हलवा बनाया, पंडित जी को भोजन करा कर सभी के लिए हलवा परोसा. पहला  निवाला   खाते ही सभी मुंह बनाने लगे तो  ससुर जी ने गुस्सा होते हुए कहा, क्या घर में देसी घी नहीं है जो इस तरह का हलवा बनाया है? सरला ने पूरी घटना सभी के सामने कह दी. अब मुंह छुपाने की बारी विमला जी की थी.

बेचारी सरला, बहुत सोच समझ कर काम करती, लेकिन अपनी सासु माँ की बात समझ ना पाती. करवा चौथ के त्यौहार पर सरला अपने सास ससुर के लिए कपडे, उपहार, मिठाइयां आदि लाई, तो उसकी सास ने अप्रत्यक्ष रूप में कहा-"बहु, त्यौहार पर शगुन भी देना होता है, चाहे फिर वो सिक्का ही क्यों ना हो." सरला ने मुस्कुराते हुए कहा, हांजी मांजी...

शादी के बाद पहली दिवाली... सरला बहुत खुश थी. पूरा घर दीपों से जगमगा रहा था और साथ ही पकवानों से महक रहा था. सरला की नन्द का परिवार और उसके जेठ जेठानी, जो दूसते शहर में रहते थे, सभी दिवाली मनाने आये हुए थे. रात को लक्ष्मी पूजन के बाद सरला और उसका पति सभी को उपहार और सिक्के की पोटली देते हुए आर्शीवाद ले रहे थे. सभी ने अपने उपहार और पोटली खोली तो हैरानी से एक दूसरे को देखने लगे, क्योंकि पोटली में एक रूपये का सिक्का था.

विमला जी सिक्के को हाथ में लेते हुए बोली- एक रूपये का सिक्का ये कौन देता है? तो सरला ने बड़ी मासूमियत से कहा, की आपने ही कहा था की "त्यौहार में शगुन के तौर पर सिक्का देना चाहिए". विमला जी सर पकड़ कर बोलने लगी, अरे! सिक्के का मतलब चांदी के सिक्का से था.

सरला की आँखों में आंसू आ गए, रोते हुए बोली.. सासु माँ मुझे माफ़ कर दो. मैं आपकी बात समझ नहीं पाती. सरला की सास शर्मिंदा होते हुए बोली, "बहु, माफ़ी तो मुझे मांगनी चाहिए. मैं ही, तुम्हे, हर बात घुमा फिराकर और अप्रत्यक्ष रूप में कहती. मेरी ही गलती है... मैं अपनी सरल बहु को समझ नहीं पाई. और प्यार से सरला को गले लगा लेती है.

सभी ने एक रूपये के सिक्के को बरकत के तौर पर सर माथे लगा लिया.

 

 

 


तारीख: 31.07.2020                                                        मंजरी शर्मा






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