विकल्प

 

रोज़ की तरह सुनीता डिनर की तैयारी कर रही थी, हाथ अपनी रफ़्तार से चल रहे थे. दो सब्ज़ियां, दाल, चावल, रोटी, रायता, सलाद, आचार, और पापड़... सब तरफ नज़र दौड़ाई ...अपनी तरफ से तो वो रोज़ तैयारी करती थी, पर अमित को कब क्या कमी नज़र आ जाये पता नहीं था. सब कुछ परफेक्ट और पूरी डाइनिंग टेबल सजी होनी चाहिए थी. सुनीता आठ बजे तक डिनर तैयार कर लेती लेकिन अमित के आने का कोई टाइम नहीं था मर्ज़ी है तो सात बजे आ जाये या फिर ग्यारह- बारह भी बज सकते है. पहले तो वो फोन कर लेती थी लेकिन अमित के रूखे व्यवहार के कारण फोन करना भी बंद कर दिया.

हालांकि अमित के आने से ना तो सुनीता को कोई फर्क पड़ता और ना ही उसकी मासूम बच्ची मिन्नी को. जब तक अमित घर से बाहर होता है, मिन्नी, चेहेकती - फुदकती रहती है लेकिन जैसे ही बेल की आवाज़ आती है, अपने कमरे में जाकर छिप जाती है. घंटी के बजने से ही दोनों को पता चल जाता की दरवाज़े पर अमित ही है और वो भी गुस्से में.  सुनीता फटाफट दरवाजा खोलने जाती और वो दरवाज़ा खुलने तक दो चार भद्दी गालियां दे डालते, खैर सुनीता ने गुस्से का जवाब देना बंद कर दिया था.

अब तो रोज़ का नियम था, वो दरवाज़ा पीटते, भद्दी गलियां निकालते, बाहर का गुस्सा हम पर या फिर खाने पर निकालते. सुनीता ने अमित को बहुत समझाया, की मिन्नी अब बड़ी हो रही है, घर में गाली-गलोज और बेकार का गुस्सा ठीक नहीं. तुम आराम से अपनी बात मुझसे शेयर कर लिया करो लेकिन प्लीज् फ़्रस्ट्रेशन को हम पर मत उतारा करो. लेकिन अमित पर इन बातों का कोई असर ना होता उल्टा गुस्से में सुनीता पर ही हाथ उठा देता. कभी कभी तो बेकसूर मिन्नी ही अमित के गुस्से का शिकार हो जाती. बचपन से ही मिन्नी सेहमी आँखों से अपने पापा को देख रही थी, और बच्चों की तरहमिन्नी भी चाहती थी की घर लौटते ही वह अपने पापा के बाहों में झूल जाये और उसके पापा उसे चूमते हुए कभी टॉफी तो कभी चॉक्लेट लाये. लेकिन मिन्नी को देखकर सुनीता की आँखे भर जाती इतनी छोटी सी उम्र में उसके दिल पर क्या बीत रही है अमित को कोई फर्क नहीं पड़ता.

विकल्प तो सुनीता के पास थे.कभी कभी तो मिन्नी को तड़पता देख सुनीता सोचती की उसे लेकर कहीं दूर ले जाये, इतनी दूर जहाँ पिता का हाथ क्या साया भी ना हो.एक विकल्प की पुलिस स्टेशन जा कर घरेलू उत्पीड़न का मामला दर्ज़ करा कर जेल करा दे या फिर अमित को उसके हाल पर छोड़ कर अपने माता पिता के पास चली जाए या अमित से तालक लेकर नई दुनिया बसा ले या अपना हक जताकर इसी घर में  बस जाए. फिर सोचती विकल्प तो अमित के पास भी है सुधर जाने का अच्छा इंसान बनने का विकल्प या अपनी पत्नी को इज़्ज़त देने का विकल्प या फिर अपनी फूल सी बच्ची को मुरझाने से बचाने का विकल्प.

शायद मिन्नी के पास भी अपनी मम्मी या पापा में से एक को चुनने का विकल्प है. सुनीता सोचती विकल्प तो हम तीनों के पास ही है. अब समय ही तय करेगा की कौन सा विकल्प उनकी ज़िंदगी के लिए सही है.


तारीख: 15.07.2020                                                        मंजरी शर्मा






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