वो सुबह आएगी

वो सुबह आएगी

“ चाय बन गयी है उठ जा ” माँ के इस निर्देश के साथ ही सोनू के दिन की शुरुआत हुआ करती थी | एक तरह से यह अलार्म हो गया था | जब तक चाय तैयार होने की गूंज कानो मे नही पड़ती बिस्तर छुटते ही नहीं थे | माँ का रूटीन सालो से तय था , सुबह सवेरे उठ कर मंदिर जाना और लौटते वक्त डेयरी से दुध लेते आना | ताजे दुध की चाय वह भी माँ के हाथो की, इसके बिना अगर सुबह हो जाये तो ऐसा लगता मानो उस दिन कुछ अधूरा सा ही रह गया हो |

समय और परिस्थितियां सदैव एक सी कहाँ रहती है | लगभग आज से ग्यारह महीने पहले 24 सितंबर का वह दिन आज भी याद आता है जिसने बहुत कुछ बदल सा दिया था | सुबह – सुबह कोई घर के दरवाजे पर जोरों से आवाज़ लगा रहा था | माँ रोज की तरह मंदिर गयी थी , आवाज सुनकर नींद खुली और ज्यों ही सोनू ने बाहर आकर देखा तो माँ जमीन पर थी और उनसे उठा नहीं जा रहा था और आसपास लोग जमा थे |

माजरा ये था कि गाय को रोटी देने के चक्कर मे गाय अंदर आ गयी और पीछे हटते वक्त पैर फिसल गया | खुब कोशिश के बावजूद जब उठा न गया तो सोनू द्वारा गोद मे उठा कर घर के अंदर लाया गया | कुछ घरेलु उपाय करने के प्रयास किए पर कराहट और तकलीफ देखकर साफ लग रहा था कि चोट की गंभीरता ज्यादा है | अंतत: एम्बुलेंस बुलाई गयी और अस्पताल पहुंचे |

अच्छे बुरे दिनो का आना जाना तो हमेशा लगा ही रहता है परंतु एक लंबा अंतराल जिसमे आप कठनाइयों से जुझते है , वह अनुभवो का ऐसा खजाना देता है जिससे प्राप्त शिक्षाएं जीवन पर्यंत काम आती हैं |

उम्मीद :-

हमेशा उन परिणामो के आने की मंशा रखी जाती है जिनमे अपना हित या सहूलियत हो , इसे हम अँग्रेजी मे पॉज़िटिव थिंकिंग भी कह सकते है | जब सोनू पिता के साथ माँ को लेकर अस्पताल पहुंचा तो प्रारम्भिक जांच के बाद डॉक्टर की सलाह पर टेस्ट कराये गये जिनके आधार पर तय होना था कि फ्रेक्चर है या केवल मात्र चोट आई है | पुरा दिन इसी कयास लगाने मे बीता |

तुलसीदास जी ने लिखा है “ होत वही जो राम रच राखा ” अगले दिन आते ही डॉक्टर ने रिपोर्ट देखी और वही कहा जिसकी अपेक्षा नहीं कर रहे थे | फ्रेक्चर है ऑपरेशन करना पड़ेगा | डॉक्टर के ये कहते ही कुछ देर तक तो समझ नही आया कि क्या प्रतिक्रिया दी जाये लेकिन एक  सवाल स्व्भाविक रूप से पूंछा कि कितना समय लगेगा ठीक होने मे |

माँ के भरोसे ही पूरा घर था , आगे व्यवस्थाएं कैसे होंगी ये कल्पना से परे था | असमंजस की स्थिति मे किसी के मन मे भी समय को लेकर प्रशन उठना जायज था कि कितना समय लगेगा | डॉक्टर साहब का प्रतिउत्तर इसपर काफी निराश करने वाला था | अभी से कैसे बता सकते है , झुंझलाहट के साथ जवाब मिला , खैर कोई बड़ी बात नहीं है सरकारी अस्पतालो मे डॉक्टर से ज्यादा व्यवहार कुशल होने की उम्मीद करता ही कौन है |

पता तो था ही कि आगे की बातचीत प्राइवेट तौर पर उनके घर जाकर ही करनी होगी | अंततः निर्णय यही लिया गया कि ऑपरेशन से ही राहत मिल सकती है सो करना तो पड़ेगा ही |

झिझक :-

जब हम दुसरो की जगह खुद को रखकर खुद के बारे मे नकारात्मक विचार करते है तो भय (डर) उत्पन्न होता है | डर केवल इस बात का कि अन्य लोग आपके बारे मे क्या सोचेंगे | ऑपरेशन की तारीख तीन दिन बाद की दी गयी थी और मालूम भी था कि ऑपरेशन के कुछ तीन महीनो तक पूरी सावधानी रखनी पड़ेगी |

अब माँ को चलने मे असमर्थता थी तो हर दैनिक क्रियाकलाप के लिए सहयोग की आवश्यकता होगी ही ऐसे मे कोई महिला सहयोगनी मिल जाती जो माँ की देखरेख कर सके तो अच्छा होता | काफी प्रयास के बावजूद ऐसा कोई प्रबंध नहीं हो पाया |

अस्पताल के जिस वार्ड मे माँ भर्ती थी उसी मे कार्यरत महिला नर्स को जब इस बारे मे मालूम हुआ तो उन्होने सोनू को बुला कर कहा कि “ बेटा इसमे कैसी शर्म और कैसी झिझक अपनी माँ ही तो है | ”

अपनी परेशानियों का जिम्मा हमे खुद ही उठाना पड़ेगा न कोई उसमे हमारा सहयोग कर सकता है न उन्हे बाँट सकता है | डर और झिझक तब तक रहते हैं जब तक हम उस कार्य को करने से पहले नकारात्मक विचार बना लेते है | वास्तविकता मे ये एक मानसिक स्थिति है जो हमे कार्य करने से रोकती है |

प्रबंधन :-

परिस्थितियां स्वतः ही प्रबंधन सीखा देती हैं | पंद्रह दिन बाद अस्पताल से माँ घर आई | हालाकि अब वॉकर के सहारे कुछ चलना प्रारम्भ हुआ था पर अभी कुछ महीने खाना बनाने की ज़िम्मेदारी सोनू की ही थी | शुरुआत मे जहां खाना बनाने के काम मे वक्त ज्यादा लगता था अब धीरे – धीरे आदत मे आने के बाद आसान भी लगने लगा और वक्त भी कम लगता था |

प्रबंधन कुछ इस तरह किया गया कि सुबह जल्दी से घर के काम निपटा लिए जायें ताकि अन्य कामो जिनके लिए बाहर जाना पड़ता है वह भी समय पर हो सकें |

चाहे समय कितना ही विकट हो व्यक्ति सुविधा अनुसार परिवर्तन कर ही लेता है और दुसरे शब्दो मे कहें तो जब कोई अन्य विकल्प न हो तो अपने आप को इच्छा से या मन मार के बदलना ही जीवन का सही प्रबंधन है |

 

द्वंद  :-

निर्णय लेने मे देरी का मुख्य कारण ये द्वंद ही होता है जो निरंतर मनुष्य के दिमाग मे चलता रहता है | सरकारी अस्पताल मे ऑपरेशन के बाद डॉक्टर ने तीन से छः महीने मे ठीक होने की उम्मीद जताई थी | इस बीच जाने माने हड्डी विशेषज्ञ जो भीलवाड़ा से महीने मे एक दिन हमारे शहर आया करते थे उन्हे ऑपरेशन की रेपोर्ट्स दिखा कर सलाह ली गयी |

विशेषज्ञ ने ये कहकर द्वंद और बढ़ा दिया कि यह ऑपरेशन पुन: करना पड़ेगा | जहां कुछ महीने बीत चुके थे और मन ये सब्र कर रहा था कि बस कुछ महीनो बाद पुन: सब पटरी पर लौट आयेगा | अब या तो विशेषज्ञ की सलाह मान कर भीलवाडा जाया जाए और उनसे पुनः ऑपरेशन कराया जाये या फिर कुछ महीने इंतज़ार किया जाए इस आस के साथ कि सब ठीक हो जाएगा |

द्वंद मे कुछ महीने बीते पर ऑपरेशन के कुल छ: महीने बाद भी दर्द मे ज्यादा कोई राहत नहीं होने पर जानकारो, रिश्तेदारों , शुभचिंतको की सलाह पर अंततः निर्णय कर लिया गया कि भीलवाडा चलना चाहिए |

पवित्र रिश्ता :-

विवाह दो लोगो को एक ऐसे बंधन मे बांधता है जिसमे उनके दुख , परेशानियां , तकलीफे आपस मे बंटकर कम हो जाती है और खुशियां आपस मे बंट कर दुगनी हो जाती है | भीलवाड़ा जाते वक्त ही तय था कि वहाँ पुनः ऑपरेशन कराना पड़ेगा |

प्राइवेट अस्पताल है तो उसी हिसाब से हजारो का इंतजाम करके सोनू , माँ के साथ भीलवाडा गया | पिता घर पर ही रुके थे क्योंकि ये वह समय था जब देश मे महामारी चरम पर थी |  अस्पताल जाते से ही , कुछ जाँचे चिकित्सक की सलाह पर कराई गयी | जांच रेपोर्ट्स पर साथी डॉक्टर से चर्चा के बाद , डॉक्टर जो हड्डी रोग के विशेषज्ञ थे उन्होने अपने सहायक को बुला कर कुछ समझाया और उनके निर्देशानुसार सहायक ने बताया कि ऑपरेशन नहीं बल्कि रिप्लेसमेंट करना होगा जिसका खर्चा कुछ लाखो मे आएगा | अपने स्तर पर ये निर्णय सोनू द्वारा तो लिया नहीं जा सकता था | पुनः विचार हेतु वापस आना पड़ा |

आखिरकार इसके अलावा और कोई रास्ता भी नहीं है , डॉक्टर विशेषज्ञ है , कुछ महीनो मे चलने लगेंगी ऐसा कहा है | पूरे रास्ते न जाने कितनी दलीले तैयार कर ली थी | जो ये साबित कर सकें कि ऑपरेशन कराना ही होगा | बस अब सोनू के लिए इन सब दलीलों को पिता के समक्ष प्रस्तुत करना बाकी था | पर ऐसा कुछ हुआ ही नहीं , न तो किसी दलील की जरूरत पड़ी न ही किसी चर्चा की | ज्यों ही ऑपरेशन और खर्चे की बात रखी तो बिना किसी ज्यादा चर्चा के पिता का कहना था कि “ ऑपरेशन तो करना ही है फिर सोचना क्या , जितना जल्द हो उतना बढ़िया ” |

सारी दलीले धरी की धरी रह गई और साथ ही सोनू की हैरानी इस बात को लेकर भी थी कि जब चंद हजारो का मोबाइल लेने के लिए पिता के सामने कई दिनो दलीले देनी पडती है , नाराजगी जाहीर करनी पड़ती है तो उनके सामने लाखो की बात बिना किसी चर्चा के कैसे आसानी से खत्म हो गयी |

अग्नि के समक्ष लिए गए सात फेरे और उनके सात वचन दो लोगों को एक सूत्र मे तो बांधते है साथ ही साथ एक दुसरे के प्रति उनकी ज़िम्मेदारी भी तय करते है | इसलिए हम इसे एक पवित्र रिश्ता कहते है |

निर्णय :-

भविष्य का बहुत कुछ वर्तमान के लिए गए निर्णयो पर पर निर्भर करता है | एक आदर्श स्थिति मे सही निर्णय वह है, जिसके लिए आपका मन गवाही देता हो उसी कार्य को करना पर आदर्श स्थिति तो काल्पनिक होती है | असल मे कई निर्णय चारो ओर देखकर लिए जाते है जिसमे आप निर्णय लेते समय अपने से जुड़े अपनो के मूल्यांकन के बाद परिणाम तक पहुंचते है |

सोनू अपनी इच्छानुसार मीडिया क्षेत्र मे अपना करियर देखना चाहता था परन्तु उसकी हाल फिलहाल की परिस्थितियों मे दुसरे शहर जाकर शुरुआत करना तो अनुकूल नहीं था | सभी संभावनाओ के अनुसार शहर की ही एक टैक्सेशन कंपनी मे नई शुरुआत करना सोनू ने सही समझा | नया कार्यक्षेत्र अपने आप मे नई संभावनाओ , अलग माहौल , कुछ नई चुनौतियों से भरा होता है |

मानवीय प्रर्वती है कि वह अपने आप को स्थिति और माहौल के अनुसार ढाल लेता है और जिसमे इस गुण का अभाव होता है उन्हे दिक्कतों का सामना करना पड़ता है | खैर सोनू के साथ ऐसी कोई परेशानी नहीं थी | कुछ ही महीनो मे उसने बहुत से अनपेक्षित परिवर्तनों के बावजूद स्थितियों मे खुद को ढाला था तो अब कोई नया परिवर्तन ज्यादा अखरता भी नहीं था | सुबह 11 से 6 बजे ऑफिस का समय था उस बीच लंच मे एक घंटा घर भी आया जा सकता था क्योंकि ऑफिस ज्यादा दुरी पर नहीं था | मुख्य रूप से वहाँ के सहकर्मी बड़े शानदार थे जिनसे सोनू का कुछ ही दिनो मे ऐसा व्यवहार हो गया मानो जैसे वह यहां नया है ही नहीं |

आपके निर्णयो के परिणाम क्या होंगे ये तो भविष्य की गर्त मे है परंतु व्यक्ति का काम कर्म करते रहना है , परिस्थितियां भले आपके हाथ मे न हो और कितनी ही विपरीत क्यों न हों , उनके बीच भी क्या उचित हो सकता है इसका निर्णय लेना तो आपके हाथ मे ही होता है |

 बदलाव :-

कई बदलाव आप लाना न चाहे तो भी वे स्वत: ही आ जाते है | सोनू जिसे लौकी , तौरी जैसी सब्जियाँ बिल्कुल पसंद नहीं थी उसने महसूस किया कि ये इतनी भी बुरी नहीं होती क्योंकि ये ही वे सब्जियां है जो बिना किसी परेशानी के झटपट कम समय मे बन जाती है |

डायटिंग करना इतना भी कठिन नहीं है , जब आप जल्दी मे हों तो कुछ समय बचाने के लिए डाइटिंग के नाम पर मन को बहलाया जा सकता है |

घर के रोज़मर्रा के काम मामूली तो बिल्कुल नहीं होते | आपके पास कितने ही मित्र क्यों न हो जरूरत के समय उनमे से केवल कुछ ही आपके साथ होते है जैसा कि तुलसीदास जी ने लिखा है “ धीरज , धर्म , मित्र , अरु नारी आपदा काल परखिये चारी ” अर्थाथ आपके धीरज , धर्म , मित्र और संगनी की परीक्षा विपदा के समय ही होती है | इस तरह के कई बदलावो को इस दौर मे सोनू ने बखुबी महसूस किया था |

उतार चढ़ाव तो जीवन मे आते ही रहते है | खराब दौर भी परिवर्तन के तौर पर , अनुभव के तौर पर बहुत कुछ देकर जाता है | अबकी बार जब सोनू , दुसरे ऑपरेशन के तीन महीने बाद माँ को भीलवाडा दिखाने लेकर गया तो डॉक्टर ने वॉकर की सहायता से चलने की सलाह दी और धीरे – धीरे चलने की कोशिश करने को कहा | हालाकि अब सोनू की माँ को चलने मे पहले से काफी कम तकलीफ होने लगी है और परेशानियों का दौर कुछ कम हुआ है|

उम्मीद पर दुनिया कायम है जिस तरह पहले सोनू की सुबह “ चाय बन गयी है उठ जा ” की आवाज़ से हुआ करती थी | कुछ महीने पहले उस रात वह सोया तो उसकी सुबह आज तक हुई ही नहीं पर विश्वास पूरा है कि ये रात भी पूरी होगी और वो सुबह आएगी जब दिन की शुरुआत पुनः उन्ही शब्दो की गुंज के साथ होगी |


तारीख: 22.07.2021                                                        कल्पित हरित






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