भगवान ही मालिक

 

 

इंदौर,

था यह शहर पुरजोर,

पड़ा मगर कमज़ोर ।

 

दौर हुआ शर्मनाक,

कट गई जैसे नाक,

लगे देश पर दाग़ ।

 

डॉक्टरों पर हमला,

सेवा का सिला !

किस बात का गिला ?

 

ईश्वर पर प्रहार,

कैसा अत्याचार ?

कलयुग का संसार ।

 

स्वास्थ्य कर्मचारी,

हैं सब पर भारी,

हम सब आभारी ।

 

इन पर भी वार,

हुआ बारम्बार,

लज्जा धिक्कार ।

 

पुलिस पर धावा,

किया खून खराबा,

ये मां और बाबा ।

 

किस बात का रोष ?

क्यों इतना क्रोध ?

कुछ तो कर बोध ।

 

जो सिपाही रक्षक,

उससे क्यों नफ़रत ?

दिल बहुत है आहत ।

 

क्यों किया ये पाप ?

जो ना कभी माफ़,

थी हिंसा साफ़ ।

 

क्या गया था मिल ?

था कृत्य बुजदिल,

मैं गया हूं हिल ।

 

दिया कैसा उदाहरण ?

भेस कैसा धारण ?

कांपा ना तन ?

 

वो ईंट और पत्थर,

रोए होंगे प्रचुर,

उनका क्या कसूर ?

 

आया कहां से धर्म ?

ये कैसा कर्म ?

बड़ा गहरा मर्म ।

 

क्या थी अफ़वाह ?

जो भटका राह !

निर्मम ये गुनाह ।

 

मौजूदा हालत,

है हिन्द पे कालिक,

भगवान ही मालिक...

भगवान ही मालिक...

 


तारीख: 01.05.2020                                                        अभिनव






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