देखूँ तो, मुझ पर तुम कितना हँस पाते हो 


तुम पिज़्ज़ा बर्गर खाते हो,हम सूखी रोटी खाते है 
फिर तुम कारों में स्कूल को जाते हो, हम पैदल चले दुकानों में, जूठे बर्तन  उठाते है 
तुम जिस किताब के पन्नो को, शौख से पढ़ते जाते हो ,हम उसी पन्नो पर ढाबो ,में चाट समोसे उठाते है 
देखूँ तो, मुझ पर तुम कितना हँस पाते हो 


जो तुम मंदिर में पैसे चढ़ाते हो,हम वो चोरी से उठाते है 
तुम भर पेट खाना खाते हो,हम जूठे प्रसाद ही खाते है 
हम रात को सोने के लिए, फुटपाथों पर चद्दर बिछाते  है 
देखूँ तो, मुझ पर तुम कितना हँस पाते हो


गर्मी में सूखे रास्तो पर ,ये नंगे पैर जल - जल कर फूल गए 
आँखों में आंसू है इतने ,की सालो पहले, हम हँसाना ही भूल गए 


तारीख: 04.05.2020                                                        अंकित कुमार श्रीवास्तव






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