कर्म का सिद्धांत

 

‘युरेका’!! विधाता गर्ज कर बोला 

धरती ने पूछा ‘कौनसा ख़ज़ाना खोला?’

‘तुम्हारे लिए बनाया मैंने एक अनमोल नज़राना 

जो अबसे तुम्हारा ख़्याल रखेगा मेरी जाना’

 

ख़ुशी से मुस्कुराकर धरती बोलीं 

‘ऐ खुदा ये फैला दी मैंने अपनी झोली 

डाल दो इसमें आपका बेहतरीन तोहफ़ा 

जो हर पल रहेगा मुझसे वफ़ा’

 

ख़ुदा ने निकाला एक बंदर का बच्चा 

धरती बोली ‘ना समझो मुझे इतना कच्चा

आपका ये तोहफ़ा पहले से है मेरे पास 

एक जगह ना रूकता कभी, ना लेता ये कभी साँस’

 

ख़ुदा बोला ‘अभी तो यह दिखता बंदर

पर आगे जाकर बनेगा ये सिकंदर 

सारे संसार में बढ़ाएगा ये तुम्हारी शान 

हमारा तुम पर रहा ये एक और एहसान’

 

प्रचंड होगी इसकी बुद्धिमत्ता 

पूरे विश्व पर चलेगी इसकी ही सत्ता 

बनाएगा ये अपनी अलग पहचान 

हमने इसका नाम रखा है ‘इन्सान’

 

सूरज को बोला है की रखे इसका ख़्याल 

और चाँद रखेगा इसपे पूरा ध्यान 

तुम आज से कहलाओगी इसकी माता 

और इसे आगे बढ़ाएगा ये विधाता

 

पृथ्वी पर पड़ा इन्सान का पहला कदम 

तबसे ना ये रूका ना लिया कभी इसने दम

करता रहा बस ये अपनी ही मनमानी 

बदल दिया इसने यहाँ का सारा हवा-पानी 

 

इतना बदल दिया इसने धरती का रूप 

कि सूरज भी बोला कैसे पहुँचाऊं यहाँ अपनी धूप?

धरती तो इसे मानतीं रही अपनी औलाद 

लेकिन असल में ये निकला एक बड़ा जल्लाद 

 

झरने, नदियाँ, सागर, पर्वत, जंगल 

जैसे सबके साथ ये लढ़ रहा दंगल 

मिटा दिया इसने भगवान का भी पता 

और ख़ुद को ही ये समझने लगा विधाता 

 

धरती भी तो आख़िर कब तक सहतीं?

किस मुँह से इस राक्षस को अपनी औलाद कहती?

किया उसने फ़ैसला, गयी वो ख़ुदा के पास 

बोली आपके उस इन्सान ने रूका दी है मेरी साँस 

 

पता नहीं उसे क्या करना है हासिल

क्यों बन रहा है वो अपनी ही माँ का कातिल?

ना उसे कोई ग़म है, ना किसी चीज़ का एहसास 

जैसे बेटी समझ कर घर लाओ और वहीं बने तुम्हारी सास

 

नहीं समझ आता मुझे उसका कोई भी फंडा 

उस चाँद पर भी गाड़ दिया है उसने अपना झंडा 

इससे तो वो बंदर ही था अच्छा 

बाहर से चंचल पर मन का सच्चा 

 

ख़ुदा बोला ‘माफ़ करना मुझे ऐ धरती 

इरादा नेक था पर हो गई मुझसे गलती 

इसे बनाते वक़्त शायद चूका मेरा ध्यान 

बना रहा था मानव पर बन गया शैतान 

 

बहुत सहा तुने अब नहीं देना उसे कोई मौक़ा 

उसको अपनी जगह दिखा, ये ले मेरा एक और तोहफ़ा 

‘कर्म का सिद्धांत’ बता उसे अपनी ज़ुबानी 

अपने क़लम से ख़त्म कर रहा वो खुदकी कहानी 

 

हवा में उड़ते इन्सान को यही लाएगा वापस 

फिर से ढूँढेगा ये मुझे जब हो जाएगा बेबस

पेश हैं तुम्हारे लिए एक और नज़राना 

जिसका हमने नाम रखा है... ‘कोरोना’ 


तारीख: 30.05.2020                                                        पंकज






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