खुशियों के गन्धर्व

खुशियों के गन्धर्व 
द्वार द्वार नाचे ।
प्राची से 
झाँक उठे
किरणों के दल ,
नीड़ों में 
चहक उठे 
आशा के पल ,
मन ने उड़ान भरी 
स्वप्न हुए साँचे ।
फूल 
और कलियों से 
करके अनुबंध ,
शीतल बयार 
झूम 
बाँट रही गंध ,
पगलाये भ्रमरों ने 
प्रेम - ग्रंथ बाँचे ।


तारीख: 04.05.2020                                                        त्रिलोक सिंह ठकुरेला






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