किसे पता था ऐ ज़िंदगी

किसे पता था ऐ ज़िंदगी,
तेरे मेरे दरम्यान इतनी लम्बी
फरहिस्त होगी फ़ासलों की 
फ़ासला फ़िकरों का बेफ़िक्रियों का
होनियों का अनहोनियों का 
महफ़िलों का तनहाइयों का
फ़ासला नादानियों का भरोसों का
यकायक मिलती ख़ुशियों का अफ़सोसों का
बेख़ौफ़ फ़ैसलों का, लरजते शुबहों का

किसे पता था ऐ ज़िंदगी
तुझसे मिलना फिर बिछुड़ना 
एक नासूर का जानिब तड़पाएगा
जीने के मुझको नए मायने बतलाएगा।।

चल जाने दे, छोड़ ये नाराज़गी
या आकर गले मिले या बख्श दे रवानगी।
तुझपर क़ुर्बान मेरी सारी हसरतें
सारी खामोशियाँ और खिलखिलाहटें
सारी गुस्तखियाँ और शरारतें
सारी मुफ़लिसी और। बरकतें।

अब बस ऐ ज़िंदगी
ख़त्म कर ये सिलसिला 
आँख मिला मुझसे और मिटा दे फ़ासला
आँख मिला मुझसे और मिटा दे फ़ासला।।

 


तारीख: 27.07.2021                                                        मंजु गर्ग






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