ओ पेड़ ! तुम भी कहो अपनी व्यथा।,
जैसे कराहती है धरती पीड़ा में और तपने लगता है उसका बदन।
जैसे नदी बहा ले जाती है, गाँव-के -गाँव अपनी अश्रु धारा में।
जैसे चीखता है बादल और फट जाता है उसका ह्रदय।
तुम भी प्रकट करो अपना क्रोध।
जकड़ कर नष्ट कर दो सैकड़ों घोंसलों को अपनी भुजाओं में।
बंद कर दो उगाना नई कोपलें।
खत्म कर दो जीवन की आस।
तुम क्यों नहीं गिरते जब धधक रहे होते हो क्रोध में।
कि तुम्हारा उपकार मानने के बदले कोशिशें की जाती है,मिटाने को तुम्हारा अस्तित्व।
लेकिन तुम लगे रहते हो, सब भूल-भाल अपने सृजन कार्य में।
जैसे कोई वीर प्रतिज्ञा लेता है कि चाहे जो हो युद्ध में लड़ना नहीं छोड़ेगा। झाड़ देते हो अपना क्रोध पीले पत्तों में संजोकर जैसे तनाव बटोरते-बटोरते, समय से पहले सफेद हो जाते हैं बाल।
तुम्हारी व्यथा उतर जाती है, ममता बनकर इन रसीले फलों में जैसे मां की ममता उतरती है दूध बनकर।
तुम यूं ही फर्ज़ निभाते रहना, ज्येष्ठ संतान होने का।
थाम लेना एक हाथ में मां।
दूसरे में अपने अनुजों को।
बचा लेना यह जग।