प्रकृति एवं मनुष्य

मानव,
ध्यान से देख इस नन्हें से जीव को 
जिसने तेरे अहंकार के कर दिए प्राण पखेरू 

जिसे,
दंभ था अपने सर्वशक्तिमान और अजेय होने का
वो आज कहीं दबा हुआ, छुपा हुआ बैठा हैं

उसने,
तुझे केवल एक आंकड़ा, एक संख्या बना दिया
तू उड़ रहा था आकाश में, घुटनों पर ला दिया 

ज़नाब,
कालचक्र के इस परिदृश्य ने क्या खूब रंग दिखाये 
धरती, अम्बर, धरा के सारे जीव वापस लौट आएं

तू,
जो जा रहा था प्रकृति के हर नियम को तोड़ता मरोड़ता 
कि देख तू आज भी उसके सामने वही आदिमानव समान हैं

ये,
ना किसी को छोटा, ना बड़ा, सबको बराबर ही तो तौल रहा
फिर इंसान क्यों करता भेदभाव धर्म, पैसे और रंग के नाम पर

जब, 
दस्तूर था कि उसकी सारी रचनाएं हो एक समान
फिर भी कोई भूखा सो रहा, क्यों कोई है बिन मकान

ये,
समय हैं, कभी तेरा हैं तो कभी मेरा है 
यूं ही चला अगर तो आगे घना अंधेरा हैं

उम्मीद हैं,
कि कलयुग में मानवता फिर से सामने आएगी
जब हाथ से हाथ मिलेगा तभी तो कठिनाई जाएगी

अब,
भी हैं समय तू नींद से जाग जा रे पगले
कुछ सीख प्रकृति से और सही राह पकड़ ले
उसने हमेशा ही दिया तुझे तेरी उम्मीद से ज्यादा
फिर भी मूर्ख क्यों तू सब खत्म करने पर आमादा 

आ,
मिल कर करते हैं इस चुनौती से मुकाबला 
लेकर साथ सभी को क्या छोटा, क्या बड़ा 
ना जीत, ना हार को लेकर हो परेशान तू 
बन फिर से प्रकृति का वहीं प्यारा इंसान तू । 


तारीख: 01.05.2020                                                        रोहित अरोड़ा






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