त्रासद- काल


"लोग घरों से ना निकलें!
टाल दिए जाएं सारे आयोजन,
चेहरे ढँक कर चले सभी-जन।"
सरकारी ऐलान हुआ है-
हम 'सामाजिक-दूरी' बनाना सीख लें,
कि सबकी भागीदारी से ही
टाला जा सकेगा
यह मुश्किल-वक्त।

पर ऐसे लोग भी हैं
आस-पास ही,
जिनके लिए चेतावनियाँ सहज हैं!
बिल्कुल;
सामान्य दिनों की तरह ही।
अखबार के 'काले शब्दों' में
झांकने की आदत नहीं जिन्हें,
और न ही जुगत है
टेलीविजन की 'रंगीन दुनिया'
से परिचय पाने की।
'पराए अपराध'
हों जिनकी नियति के सूत्रधार,
उनके लिए
भीषणतम हादसा है 'गरीबी'।

जिनके खून-सने गारों पर
सजी हैं
इमारती-ईंटें,
उनके निर्वासन की तस्वीरें-
सदी का सबसे 'विद्रूप सत्य' है।

निश्चय ही
यह समय भी टल जाएगा।
पर महामारी के सारे आंकड़े
रह जाएंगे अधूरे;
जब तक कि आँक नहीं ली जाती
कीमत 'एक रोटी की'।
याद रहे-
मनुष्य की सबसे बड़ी त्रासदी है 'भूख'।


तारीख: 01.05.2020                                                        अंकित कुमार भगत






नीचे कमेंट करके रचनाकर को प्रोत्साहित कीजिये, आपका प्रोत्साहन ही लेखक की असली सफलता है