अब हम सभ्य हो रहे हैं।

परिवार बढ़ते गए,
आँगन सिमटते गए,
छतों के ऊपर घर चढ़ते गए,

अब आँगन में धूप नहीं आती,
अब छतों पर लोग नही आते।

अब चूल्हे का धुआं नही दिखता,
न चक्की का शोर है,

माँ से पूछता हूं कभी,
बड़ी माँ के घर से अब,
तरकारी की खुशबू क्यूँ नही आती?

अब शायद पढ़ने-लिखने का जोर है,
बच्चे कैद है, गलियों में न शोर है।

अब हम बड़े हो रहे हैं,
अब हम घरों के ऊपर छत हो रहे हैं,

अब हम सभ्य हो रहे हैं।


तारीख: 20.05.2020                                                        अंकित मिश्रा






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