अब कजरी के बस दिन ही आते हैं

अब कजरी के बस दिन ही आते हैं,
क्यों कजरी, कजरी नहीं गुनगुनाती ?
सावन कर देता है धरा को सराबोर,
क्यों  बूंदें मन पर नहीं पड़ पाती ?


नीम खड़ा रहता है उदास सा अहाते में,
क्यों  कोई गूजरी पींग नहीं बढ़ाती ?
बदरा देख सोच रहा नाचता मोर
क्यों मोरनी अब मिलने नहीं आती ?


लेता है करवटें हर मौसम अपने तय हिसाब से,
क्यों मौसम कोई भी हो, हमें नींद नहीं आती ?


तारीख: 21.07.2020                                                        सुजाता






नीचे कमेंट करके रचनाकर को प्रोत्साहित कीजिये, आपका प्रोत्साहन ही लेखक की असली सफलता है