अधूरा-श्रृंगार

"अधूरा-श्रृंगार"

"नमस्कार!! मीरा जी... यहीं रहती हैं?"

जी... आप कौन?मैंने कहा ...

"मैं, "ज्ञान-प्रकाशन" का सम्पादक हूँ. मीरा जी की कई कवितायेँ और कहानियां हमारी प्रेस में प्रकाशित हुई है; और इस बार तो उनकी लिखी किताब, भी प्रकाशित हुई; जिसके लिए, कल उन्हें विशेष "सम्मान" से सम्मान्नित किया जायेगा, उसी का आमंत्रण देने आया हूँ."

"लेकिन, वो तो पिछले चार महीनों से अस्तपताल में है.

ओह्ह!! क्या हुआ उन्हें??उनकी बड़ी तमन्ना थी, की 25 तारीख तक ये किताब प्रकाशित हो जाये; वैसे उन्हें हुआ क्या है?"

"मीरा को आखिरी स्टेज का 'ब्लड कैंसर' है; डॉक्टर ने उम्मीद छोड़ दी है." मैंने कहा ...

"कभी सोचा नहीं था; मीरा जी, बहुत ही ज़िंदादिल इंसान है; मैं उनसे निजी रूप में कभी नहीं मिला. लेकिन सम्पादक होने के कारण; उनकी कहानियों के माध्यम से जुड़ा हुआ हूँ. उनकी कहानिया और कवितायेँ, बहुत ही सकारात्मकता से भरी होती है और कवितायेँ भी दिल को छू लेने वाली होती है. लेकिन इस किताब में लिखी कवितायेँ हृदयस्पर्शी है और शायद, उनके दिल की आवाज़ है. शायद मन के किसी कोने में कुछ अधूरी ख्वाइश है, जिसे वो पूरा करना चाहती है."

"माफ़ कीजियेगा; एक गुज़ारिश है, हो सके तो, एक बार उनकी इस किताब की कवितायेँ अवश्य पढियेगा और खासकर आखिरी कविता..."अधूरा-श्रृंगार"; श्रृंगार की हरेक कला को, उसने उपमाओं से अलंकृत किया हुआ था,जैसे कविता एक नई-नवेली दुल्हन हो."

"ईश्वर से प्रार्थना है, की वो जल्दी ही स्वस्थ हों और उनकी अधूरी ख्वाइश पूरी हो जाये. मीरा जी को मेरी शुभकामनाएं अवश्य दीजियेगा और ये उनके लेखन का  संग्रह और उनकी प्रकाशित किताब." सम्पादक ने सुनहरे कागज़ में लिपटी किताब मुझे थमाई और चले गए.

मीरा... मेरी पत्नी; शादी को .... अरे! कल ही तो 25 तारीख़ है और हमारी शादी को 25 वर्ष पूरे हो गए.

"मीरा लिखती थी और इतनी अच्छी लेखिका है; इसका पता मुझे आज चला. मैंने उसे कभी लिखते हुए नहीं देखा.शायद खामोश रहकर मन ही मन कुछ गढ़ती रहती है. वैसे उसे ज़्यादा बोलने की आदत नहीं थी या कहा जाये की मुझे सुनने की आदत नहीं थी, इसलिए कलम के माध्यम से अपने शब्दों और भावनाओं को कागज़ पर उतारती रही. शायद कागज़-कलम से दोस्ती कर, ताउम्र उनसे बतियाती रही."

मैंने उत्सुकतावश; सुनहरे कागज़ में लिपटी किताब को खोला उस पर बहुत ही खूबसूरती से "अधूरा श्रृंगार" और नीचे मीरा का नाम लिखा था.

एक-एक पन्ना पढ़ कर लग रहा था; जैसे वर्षो से तह-दर-तह दबी उसकी आवाज़; उसके भाव; उसका दर्द; शब्दों के माध्यम से अपनी दास्ताँ सुना रहा हो.

मैंने, जल्दी ही आखिरी पन्ने को खोला. जिसमें; "अधूरा श्रृंगार" से कविता सुशोभित थी. जैसे अक्षरों को 'सोलह श्रृंगार' से सुसज्जित कर 'सुहागन' बना दिया था. कविता पढ़कर, आंखों के कोरों से, आंसू कब बाहर आ गए पता ही ना चला.

"एक बार फिर से सुहागिन बना दो,
मेरा अधूरा श्रृंगार सजा दो...
लगाने दो माथे पर बड़ी सी बिंदिया,
जो रात की उड़ादे तुम्हारी निंदिया...
लगाने दो लाल सिन्दूर,
अगर तुम्हे हो मंज़ूर...
हूँ, मैं, मंगलसूत्र की दीवानी,
जो मेरे सुहागन होने की है निशानी...
लगाने दो आँखों में काजल,
छाने दो संध्या का बादल...
ललाट पर चमकने दो मांग टीका,
और कानों में झूमने दो बड़ा सा झुमका...
अपने प्यार के रंग की लगाने दो मेहंदी,
खिल जाए जैसे कोई सुंदरी...
बालों में कजरा महकने दो,
थोड़ी इत्र की खुशबू में बहकने दो...
नाक पर सजा लू नथनी,
इस बार ना मानूँ, तुम्हारी कथनी...
चूड़ियां खनकती रहे, बिछुए चमकते रहे,
पायल की झंकार भी बजती रहे...
कमरबंद और बाजूबंद पहन,
डोलती रहूं यहाँ से वहां...
सुर्ख लाल जोड़े में लिपटी रहूँ,
इन सोलह-श्रृंगार से चेहेकती रहूँ...
देख मेरा दिलकश नज़ारा,
एक बार चाँद ज़रा शर्मा जा...
एक बार फिर से मुझे अपना लो,
मुझे फिर से सुहागन बना लो,
मेरा अधूरा श्रृंगार सजा दो..."

एक-एक शब्द; मीरा के दर्द को बयान कर रहा था. सच ही तो कह रही थी मीरा.... पत्नी तो बना कर ले आया, लेकिन उसका श्रृंगार; उसका मातृत्व; उसका अस्तित्व; सभी अधूरा है.... सिर्फ और सिर्फ, मेरे अहम के कारण.

मीरा; बहुत ही सुन्दर-सौम्य, मधुर और सरल स्वभाव की है. बाह्य सुंदरता के साथ-साथ मन से भी अति सूंदर. और यही सुंदरता मेरे 'अहम और वहम' को बढ़ाने लगी. उसे सजने-संवरने, मुस्कुराने का शौंक था. खुले आकाश में उड़ने की चाह थी. पर मैंने तो, उसके पंख काट दिए. मातृत्व को जीना चाहती थी; पर अपनी कमी के कारण, उसे ये सुख भी ना दे पाया और ये कलंक भी उसके माथे मढ़ दिया. सब कुछ छीन लिया उसका... सिर्फ बंद पिंजरे में, सोने की चिड़िया की तरह फड़फड़ाती रही और कुछ समय बाद बिलकुल मौन हो गई.

ऐसा नहीं की, मैं उससे प्यार नहीं करता या उसका दर्द नहीं समझता. लेकिन मेरा पुरुष-अहम; उसे स्वीकार नहीं कर रहा था. मानसिक-पीड़ा के साथ-साथ; पिछले दो वर्षों से, कैंसर जैसी बीमारी से जूझ रही थी; पर इसका पता भी मुझे लगभग चार महीने पहले पता चला, जब बहुत देर हो चुकी थी.

लेकिन, अब और देर नहीं. यही सोच; की और कुछ नहीं, कम से कम, उसका "अधूरा-श्रृंगार" तो पूरा करूँ. मेने, उसकी अलमारी खोली. बहुत दर्द-भरे, शब्दों की कहानियों के पन्ने ... एक नन्हे से बच्चे की तस्वीर और कुछ खिलोने रखे थे.बहुत ही सुन्दर-सुन्दर, गहरे रंग की साड़ियां, रंगबिरंगी चूड़ियां, पायल, बिछुए और श्रृंगार का सामान उसके बक्से में चमचमा रहा था; जिसे उसने कभी पहना ही नहीं था; क्योंकि, मुझे पसंद नहीं था. मैंने सारा साज-सज्जा और श्रृंगार का सामान उठाया, साथ ही शादी का लाल-जोड़ा बैग में पैक किया. कल शादी की 25वीं सालगिरह पर उसकी अधूरी-ख्वाइश पूरी करूँगा; इसी आशा से, अस्तपताल की तरफ चल पड़ा.

रास्ते से, फूलों का गुलदस्ता और उसका पसंदीदा मोगरे का गजरा लिया. मन सरपट उससे मिलने को बेताब हो रहा था.

अस्तपताल पहुंचा... "किताब दिखाते हुए; उसे ढेरो शुभकामनायें दी और साथ ही सालगिरह की बधाई दी. लेकिन, ये क्या... "मीरा; कुछ बोल क्यों नहीं रही हो?? मुझसे नाराज़ हो???? मैं तुमसे माफी मांगने आया हूँ और...और... देखो; ये श्रृंगार का सामान.
मैं..... मैं; तुम्हारा, "अधूरा-श्रृंगार" पूरा करने आया हूँ."

"माफ़ कीजियेगा; मीरा जी; अब नहीं रही ..."; डॉक्टर ने कहा ..

कुछ समय बाद, नर्स ने मुझे कमरे में बुलाया. मीरा को दुल्हन की तरह सजाया गया था. उसका "अधूरा-श्रृंगार" पूरा हो गया था; पर मैं, उसके बिना अधूरा रह गया...


तारीख: 21.07.2021                                                        मंजरी शर्मा






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