अँधेरे में प्रकाश

अभी-अभी..
हाँ!बिल्कुल अभी,
मैंने एक पत्ता गिरता देखा है।
रात्रि के दूसरे पहर में,
बैठे हुए अपनी मेज पर
झाँकते...वक्त-बे-वक्त
बाहर खिड़की के,
गहराते अँधकार और
धुँधलाती रोशनी के दौरान,
आ रही है जो मेरे आँगन पर 
लटके बल्ब से छनकर।
हाँ!मैंने एक पत्ता गिरता देखा है।

मैंने देखा है इसे गिरते हुए..,
ज्यों गिरता है आदमी
अपनी बातों से आजकल
...घूम-घूमकर,
मैंने देखा है इसेे टूटते हुए
अपनी शाखा से;
महसूस किया है
जड़ों का यह अलगाव।

वह पत्ता गिरा तो...
परंतु गति नहीं दिखी
मुझे 'उसमें' कोई,
ना कोई उमंग
...ना ही दिशा
और सहसा उसका अंतर्धान हो जाना-
उसी ओर जाती पगडंडी के आस-पास
केवल नीरवता,
निस्तब्धता में...!

क्या पतन है ये,
उसके वजूद का?
या अवसान..
मेरी ही आत्मा का?
ऐसे ही प्रश्न
रह गए हैं कई,
...अनुत्तरित!
जिन्हें उद्दीप्त कर,
गिरा है अभी-अभी...'एक पत्ता'।।


तारीख: 24.08.2021                                                        अंकित कुमार भगत






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