बस जीने को जी चाहता है

जिंदगी की उलझनों से बाहर निकलने को जी चाहता है
जमाने की बंदिशों को आज तोड़ने को जी चाहता है


बेफिक्र सी मुस्कुराहटों में जरा खोने को जी चाहता है
नादान,नासमझ,मासूम होने को जी चाहता है


खुद से बस खुद से मोहब्बत करने को जी चाहता है
बच्चों के जैसे बस जिद्द में रोने को जी चाहता है


उम्मीदों की गिरफ्त से आजाद होने को जी चाहता है
ख्वाबों की रंगीन दुनियां में सुकून से सोने को जी चाहता है
इस मतलबी सी दुनियां में खुद के लिए जीने को जी चाहता है।


तारीख: 07.04.2020                                                        स्तुति पुरवार






नीचे कमेंट करके रचनाकर को प्रोत्साहित कीजिये, आपका प्रोत्साहन ही लेखक की असली सफलता है