बुद्ध

तथागत,

तुम तो चल गए ,

रिश्तों का मोह त्याग कर,

हर दुख की आँच ताप कर,

जीवन की जटिलता माप कर,

अँधेरों की गहनता भांप कर,

गैरों को रौशनी बांट कर,

दुनियावी किस्से बांच कर !

लेकिन न जाने क्यों,

मुझसे न हो पाएगा !

मेरे भीतर का बुद्ध

अभी न जाग पाएगा !

रिश्तों से मोह बना हुआ है,

सुखों का स्वागत शुरू हुआ है,

जीवन पहेली सुलझ रही हैं,

सपनों की दुनिया सज रही है,

फसाने लबों पर आने लगे हैं,

गिले-शिकवे सब ठिकाने लगे हैं,

ये सब सच बनाने में जमाने लगे हैं !

अब हम भी खुद को आजमाने लगे हैं !

बस,

हो सके तो मुझे माफ कर देना,

तथागत,

जहां हो वहीं से

मेरे जीवन का भी हिसाब कर देना!

क्योंकि मुझसे अभी न हो पाएगा,

मेरे भीतर का बुद्ध अभी न जाग पाएगा !


तारीख: 17.05.2020                                                        सुजाता






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