बस की बात

आसमान का 

एक भारी हिस्सा, 

टूट कर गिरा था 

घरती के 

नाजुक सीने पर।

 

न आसमान 

उसे रोक सकता था,

न धरती 

उसे संभाल सकती थी,

 

सोचती हूँ

किसी को 

क्या करना था,

कहती हूँ

कोई कर भी 

क्या सकता था।


तारीख: 01.08.2020                                                        भावना कुकरेती






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