कालेज के किस्से

कालेज के थे किस्से अजीब, अजनबी थे जो आये करीब । 

कुछ मस्त परिंदे से आये, थे बेपरवाह जमाने से ।

आँखों में सपनों के दहक लिए, जलते थे जो परवाने से ।।

कुछ बेकरार उड़ जाने को, कुछ आये टापर कहलाने को ।

कुछ की मंशा छा जाने की, कुछ आये थे धौंस जमाने को ।

कुछ पाना है ठान के आये थे, पर कुछ चेहरे घबराये थे ।

कुछ बड़बोले, कुछ इठलाते, कुछ बेखौफ़ कागभुषुंडी थे ।

कुछ के हाथों का वजन बड़ा, कुछ मन से बड़े फिरंगी थे ।।

कुछ जामवंत वरदानी थे, कुछ सियाराम से ज्ञानी थे ।

क्या खूब था अपना दल-बल वो, सबके सब बड़े तूफानी थे ।।

कुछ के नैन गिलहरी थे, हर वक्त किसी पर गिरते थे । 

था उनमें नशा मैंखानों का, ऑखों से सब कुछ कहते थे ।।

सावन बीते जीवन के चार, कुछ दिल की तस्वीर ना दिखलाये । 

तीन शब्द जादुई से, वो मौन तोड़ ना कह पाये ।

कुछ कह आये, कुछ ठहर गये, कुछ के कहने में प्रहर गये । 

दिल की बाजी कुछ जीत गये, हारे मन से कुछ मीत गये ।।

पर सबकी एक कहानी थी, आँखों में झलकती इक रानी थी ।

इक चाँद छुपा था हर मन में, सबने पाने की साजिश की ।

पर व्याकुल मन ना समझ सका, हर दिल की वही तो ख्वाहिश थी ।।


तारीख: 13.09.2021                                                        अजीत कुमार सिंह






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