दर्द जिस्म नहीं, रूहानी है

फिर शाम हुई, फिर अंधेरा छाया,

फिर कोई नज़्म छिड़ी, फिर किस्से उभरे दिमाग पर,

फिर घुटन, उदासी और तकलीफ़,

फिर लब खुले, आंख बही।

फिर तीरा नाम उठा, और कई बात चली,

मैं उठा और ये रात चली,

फिर चुभा कोई कांटा तो समझ आया,

दर्द जिस्म नहीं, रूहानी है, 

चौका, चीखा, दुःख हुआ पर चाहकर भी रो न पाया।


तारीख: 20.05.2020                                                        अंकित मिश्रा






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