देख अब सरकार में

जमीर मेरा कहता जो करता रहा था तब तक ,

मिल रहा था मुझ को  क्या  बन के खुद्दार में।

बिकना जरूरी था  देख कर बदल गया,

बिक रहे थे कितने जब देखा अख़बार में।

 

हौले सीखता गया जो ना थी किताब में ,

दिल पे भारी हो चला दिमाग कारोबार में ।

सच की बातें ठीक है  पर रास्ते थोड़े अलग ,

तुम कह गए हम सह गए थोड़े से व्यापार में।

 

हाँ नहीं हूँ आजकल मैं जो कभी था कलतलक,

सच में सच पे टिकना ना था मेरे ईख्तियार में।

जमीर से डिग जाने का फ़न भी कुछ कम नहीं,

वक्त क्या है क़ीमत क्या मिल रही बाजार में।

 

तुम कहो कि जो भी है सच पे हीं कुर्बान हो ,

क्या जरुरी सच जो तेरा सच हीं हों संसार में।

वक्त  से जो लड़ पड़े पर क्या मिला है आपको,

हम तो चुप थे आ गए हैं देख अब सरकार में।

 

 


तारीख: 12.09.2020                                                        अजय अमिताभ सुमन






नीचे कमेंट करके रचनाकर को प्रोत्साहित कीजिये, आपका प्रोत्साहन ही लेखक की असली सफलता है