धूमिल हो रहे उजाले

धूमिल हो रहे उजाले,
मेरा कमरा भी धुंधला होता है।

ये बदन, ये बाहें औ उंगलिया
फिसल रहे सब हाथो से मेरे।

आ पास तेरी नजरें उतारूं मैं हज़ार,

इक बस तेरे चले जाने से,
मेरा शहर बदनसीब होता है।


तारीख: 20.05.2020                                                        अंकित मिश्रा






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