घाट-ए-बनारस

पता न क्यूँ,

बनारस बुलाता है।

मन होता है बनारस में ही रम जाऊँ ।

बनारस में ही बस जाऊँ।।

बैठूं दिन और रात गंगा घाट पर।

सो जाऊँ वही किसी की खाट पर।।

न कोई टोके न कोई रोके,

मैं लुक जाऊँ वहां के साहित्य में।

मैं  छुप जाऊँ वहां के अध्यात्म में।।

तू भी आ के रम जाये मुझमे।

गंगा घाट पर थम जाये मुझमे।।

वहां बैठ तू मुझमें खुद को ढूंढे।

मैं तुझमें खुद को ढूंढू।।

 


तारीख: 12.09.2020                                                        रितु राज सिंह






नीचे कमेंट करके रचनाकर को प्रोत्साहित कीजिये, आपका प्रोत्साहन ही लेखक की असली सफलता है