गुलज़ार

देखा है मैंने एक शख्स

झक्क्, सफैद लिबास में

संजीदा , खोया-खोया सा

मानो हर पल शब्दों से

बातें करता रहता हो

और शब्द भी जैसे

उससे कानाफूसी करते ,

बच्चों की तरह ,

मचलकर उसकी उंगली थामे,

बिन सोचे-समझे चल पड़ते हों उसके साथ

जी भर खेलते हों फिर दोनों

कभी ऊँचे आसमान में ,कभी रेगिस्तान में ,

कभी समंदर की लहरों संग

अठखेलियां करते ,

कभी महकते फूलों से भरे बाग में ,

कभी बारिश में ,

कभी खिलखिलाती धूप में !

और यूंही खेलते-खेलते

रच देते हैं चुटकियों में कविताएं ,

और कर देते हैं हमारा भी जीवन

गुलज़ार दोनों !

 

 


तारीख: 18.08.2020                                                        सुजाता






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