हम कुम्हार

हम कुम्हार अपनी माटी के

नित नित संवारे अपने को

माटी जैसे नरम बने हम 

दंभ द्वेष से दूर रहे हम ।

माटी में रच बसकर 

हम माटी बन जायें

माटी में ही बाग लगाया 

माटी से ही घर को बनाया।

माटी का सब मोल समझो

अंत में माटी मेंं ही मिल जाना है। 


तारीख: 05.09.2020                                                        अनिता कुलकर्णी






नीचे कमेंट करके रचनाकर को प्रोत्साहित कीजिये, आपका प्रोत्साहन ही लेखक की असली सफलता है