इंद्रधनुष

 

आसमान हुआ मटमेला सा, 

रिम-झिम धीमे-सहमी सी,

संसार दमकता सतरंगी रोशनी से जब,

 

माटी की महक लिए,

शीतलता की पवन तले,

आये दबे पाँव इक सुनहरी ख्वाब के जैसे, 

 

बरसात में भीगा वो गगन पर छा गया |

मन खुशहाल को वो नित भा गया ||

आज इंद्रधनुष आ गया |||

 

रंगो से सराबोर सागर का प्रतिबिंब हो जैसे,

अनेको प्रकाश-बिन्द टिम-टिमाते हो क्षितिज पर जैसे, 

इक शाख पर हो पनपते सुर्ख, गुलाबी और नीलम के पुष्प जैसे,

 

उडते पक्षी करते अभिवादन, 

देवीय कृति लगती मनभावन, 

आतम विभोर भये सब, करते स्तुति-गायन

 

सृष्टि की आभा पे निखार बेहद ला गया |

सारे विश्व की खुशियाँ कोई आकर महका गया ||

आज इंद्रधनुष आ गया |||

 

 

लगता है एक लोक से दूजे का सेतु हो जैसे, 

कुदरत पर रज आया हो सIजो-श्रृंगार जैसे,

सौर-मण्डल मे हो छिड़ी संगीत की तरंगें जैसे,

 

हो देवलोक में आज रंगारंग जैसे,

सुरों का ध्वज लहराता हो मचलकर जैसे,

परियां हो उडेलती गागर-भर रंगीन खुशबुए जैसे,

 

इक स्वर्णिम शुभाशिष को सर्व जन पा गया |

इक परम उन्माद, इक हर्षोलास मन में समा गया ||

आज इंद्रधनुष आ गया |||


तारीख: 12.09.2020                                                        योगेश मित्तल






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