जागरण गीत 

 

सूर्य दीप्ति को तेज हीन 

जब करने लगे श्यामल बदरी 

जब बिना चन्द्र ही यात्रा में

निकल पड़ी हो विभावरी ।

 

लिखते जाना तुम अविरत 

दिवा के आगमन गीत  

ओज तेज के परि पूरक 

चिर शक्ति के जो हों प्रतीक ।

 

जो राम सेतु के पत्थर हों 

भव सागर में भी ना डूबें 

हों अटल भक्ति प्रहलाद की वो 

जो जलकर के भी ना छूटें ।

 

आकाशगंगा में विद्यमान 

ध्रुव तारे जैसे दीप्तिमान 

वो गीत बने रथ का पहिया 

घायल अभिमन्यु का स्वाभिमान ।

 

सूर्य के सातों अश्वों से 

जो तीव्र, धवल, बलशाली हों 

वो गीत हों लाठी का संबल 

जिनसे जन्मी आज़ादी हो ।

 

द्वेष से जब सृष्टि में 

अनुराग गौड़ हो जाएगा 

वो गीत तब गांडीव बन 

खुद पर विश्वास सिखाएगा ।

 

संघर्ष तरू की मंजरी से 

मांग कर के बल लिखना 

वातायन में पथ भूला है आज 

उस गीत का तुम कल लिखना ।

 

तिरस्कार से आहत हो 

तुम मौन ना होना आज प्रिए 

नभ से पर्वत तक गूंजे जो 

उस गीत का हो निर्माण प्रिए । 

 


तारीख: 12.09.2020                                                        हर्षिता सिंह






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