कछुओं का तट पर लौटना!

Turtle


जल रहे हैं जंगल
भीषण लपटों में,
उठा है धुंआ किंतु
शहरों के 'ठीक बीच' से।
जो करता जाएगा पार
हर दायरा,
हर परिधि को लांघ
ग्रस लेगा समूचा आसमान
शनैः-शनैः।

जब हम नींद में थे,
एकदम 'बेसुध',
तभी महसूसे गए हैं
झटके,भूकंप के-
किसी दूर देश में।
'मानव सारे' दुबके पड़े हैं घरों में
मात्र स्वयं को
बचा लेने की 'क्षुद्रता' से भरे।
 कि आहिस्ता ही-
चला आ रहा है ज़लज़ला
हमारे बसेरों की ओर।

धर्म-शास्त्रों में दिख रहे हैं
सृष्टि के विनाश-लक्षण;
हर ओर है चर्चा
'दुनिया के अंत' की।
जो 'प्रकृति' ने तलब किया है
अपने 'हत्यारोंपितों' को!

किंतु,
सड़कों पर निकल आए
बारहसिंगों ने
जताया है विरोध,
मांगा है 'अधिकार' बराबर का
अपने साथियों के हित में।
किंतु,
तट पर लौट आए
कछुओंं ने
दी है चेतावनी-
"हर बार 'प्रलय की आशंका'
अंत की नहीं तैयारी;
हो सकती है 'पर्याय'
कूच का-
एक 'नई दुनिया' की ओर।"
                            


तारीख: 30.05.2020                                                        अंकित कुमार भगत






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