कहीं छुट ना जाय

कहीं छुट ना जाय,
जरा ठहर जाओ।
कहां भाग रहे किस ओर जाना है?


सृजन तो यहां है कलियां मुस्कुराती,
कोयल गीत गाती, भौंरा करता गुनगुन,
धूप-छांव सुहलाती, तितली है खेलती।


तो फूल भाव दिखाते, मिलने को दो-दो मन
आतुर इतराते, सुंगध आम्र बौरों की,
मद सा भर जाती और ये चिड़िया ची ची करती जाती,
पीला धुला हुआ उजास,मन भर  जाता।


प्रेम यहां गुनगुनाता, कहां जा रहे,
ज़रा ठहरो,
कहीं छुट ना जाय,आओ बसंत देख ले।


तारीख: 27.05.2020                                                        रेखा पारंगी






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