कुछ तो ऐसा होता है

कुछ तो ऐसा 
होता है
सिसक रही है भोर।

तम होता तो
पड़ता फाँका।
आज उजाला
घर पर झाँका।।

शाखें-
हो रहीं कटखनी
है पंछी का शोर।

अदालत अब
करती अन्याय।
निकलती है
पीड़ा से हाय।।

हाँथों की
हथकड़ी बनी
क्यों रेशम की डोर।
 


तारीख: 27.08.2021                                                        अविनाश ब्यौहार






नीचे कमेंट करके रचनाकर को प्रोत्साहित कीजिये, आपका प्रोत्साहन ही लेखक की असली सफलता है