लौट जाऊँगा अपना घर

मेरे नशों में
कहीं प्रवाहित है ब्रह्मपुत्र नद
इसी की
सभ्यता और संस्कृति से
लालित-पोषित
पंचतत्व का अमानत
यह तन।

काल-प्रवाह ने सींचा है
शंकर-माधव की
ज्ञान-समद्ध परंपरा
मेरे मन एवं मस्तिष्क में।

कहीं अन्तस्थल में
गुँजती हैं वेद की  ऋचाएँ...

ऋषि-मुनियों की त्याग
एवं वलिदान की भावनाओं में लीन
इस जीवन को
सूरज की लालिमा की तरह
पूर्णता से जीकर
इस संसाररूपी यज्ञकुंड में
पूर्णाहूति देकर
लौटाऊँगा उस अग्नि, वायु,
पानी, मिट्टी एवं शून्यता को।

और निवृत्त होकर
लौट जाऊँगा
मैं अपने घर को।


तारीख: 06.07.2021                                                        वैद्यनाथ उपाध्याय






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