माँ

 

एक ही शब्द काफी है परिभाषित करने के लिए,

पुत्र का प्यार ही है उसे सुशोभित करने के लिए ।  

बिन कहे ही समझ जाती वो दिल की हर बात,

अपने आँचल मे वो कर लेती सबको आत्मसात ।

 

जिसकी वंदना करे सृष्टि के ब्रम्हा विष्णु महेश,

वो कैसे कर सकती है घर मे कोई क्लेश ।

उसके बिना लगे घर आँगन हमेशा सूना,

उसके होने से ही खुशियाँ हो जाती दूना ।

 

हमेशा रक्षा करती उसकी दुआएँ बन मजबूत ढाल,

जब भी कोई बलाएँ हो पड़ती आन ।

हर मुश्किल का हँस कर लेती सामना,

ना कभी रखे वो मन मे कोई दुर्भावना ।

 

जिसका संबल ही हो पुत्र का आधार,

जिसके संस्कार, चरित्र और हो उच्च विचार ।

उस देवी को करता हूँ नमन बारंबार,

उसके चरणों मे अर्पित धवल पुष्पहार ।


तारीख: 30.05.2020                                                        तरुण आनंद






नीचे कमेंट करके रचनाकर को प्रोत्साहित कीजिये, आपका प्रोत्साहन ही लेखक की असली सफलता है