मैं अपना आसमान रचूंगीं

जा,

मैं तुझसे फिर कभी नहीं मिलूंगी,

न कभी तेरा कोई सतरंगी ख्याल बन कर

तेरे कैनवस पर कोई चित्र बन उभरूंगी !

 

न कभी तेरे किसी गीत में,

फूल, तितली, बहार और प्यार को

सहेजकर रचे गए भावों में बस

तेरे दिल के बोल बन उतरूंगीं!

 

न कभी तेरे उपन्यास की

किसी कहानी के

किसी शोख किरदार में अदाएं लुटाती

उसके रोमांटिक मूड में बसूंगीं!

 

न कभी तुझे सागर समझ

एक नदी की तरह प्यास से बेचैन,

तुझसे मिलने को बेताब

बदहवास होकर कलकल करती  बहूंगी !

 

न कभी तुझे आसमान समझ

धरती की तरह

तेरे विशाल आगोश में

समा जाने को आतुर तुझे तकती,

एक इंद्रधनुष बन तुझ तक पहुचूंगी !

 

न कभी तुझे प्रेम समझ ,

तुझे पाने को स्वयं के अस्तित्व को भुला,

तेरे चरणों में अपना सर्वस्व अर्पण कर ,

तुझे अपना ईश्वर बना,

अपनी हर आती-जाती

सांस के मनकों की माला बना

हर पल तेरे नाम का मंत्र जपूंगी !

 

मैं सचमुच तुझ से अब कभी नहीं मिलूंगी!

मैं अपनी कहानी स्वयं लिखूंगी !

मैं अपना कैनवस स्वयं रंगूंगी !

मैं अपना गीत स्वयं गढूंगी!

मैं अपना सागर स्वयं बनूंगी!

मैं अपना आसमान स्वयं रचूंगीं!

मैं अपना ईश्वर स्वयं रहूंगीं!

 

क्योंकि हर प्रेम कहानी में

अमृता-इमरोज़ का सा इश्क हो,

ज़रूरी नहीं !


तारीख: 25.06.2020                                                        सुजाता






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