मैं और मेरा मन

मैं और मेरा मन,
होते हैं हरदम सुन्न,
कभी भविष्य में खो जाते,
कभी वर्तमान में उलझ जाते।
कतरा कतरा वक्त का यूं चुरा लेते,
जीवन में मानो खुशियां अपार पा लेते,
मन के कोने में एक आहट उठती,
हृदय के आंगन में कलिया है खिलती।
मैं और मेरा मन,
होते हरदम सुन्न।।
कभी ना पाकर भी खुश हो जाते,
कभी खोकर भी दुःखी ना हो पाते,
लम्हा लम्हा समय का चुरा लेते,
कभी मैं मन को,कभी मन मुझको रास आ जाते।
है हम दोनों ही विरले,
जग से भूले बिसरे और निराले।
मैं और मेरा मन,
होते हरदम सुन्न।।
स्वरचित एवं मौलिक।
 


तारीख: 24.08.2021                                                        रेखा पारंगी






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