माटी और मृत्यु

मेरी कौम में,

मृत्यु के बाद

विसर्जित की जाती रही हैं-

अस्थियाँ

वाहित जल में,

जब ठंडा चुका हो

जीवन का ताप।

तुम्हारी कौमें सौंपती रही हैं,

मिट्टी की अमानत

वापस इसी माटी को।

 

फिर इसी मिट्टी पर

होता है बीजांकुरण,

बढ़ते हैं जंगल

और खिलते हैं फूल..,

जो पृथ्वी पर जीवन को सींचते हैं;

पुनः उसी जल से।

इसी धरती पर

मिट्टी और जल के संयोग से

खूब लहलहाती हैं फसलें,

मृत्युलोक में जो

जीवन को सख्ती देती हैं।

 

मौत के बाद के सफर में

कुछ आदमी

पेड़ बन जाते हैं,

वहीं कुछ पेड़ों को मिलती है

मनुष्यों की काया।

 

इस प्रकार

हम दोनों ही साक्षी हैं

इस तथ्य के

कि माटी और मूरतें,

जल और जीवन से चैतन्य होती हैं।

इस प्रकार

हम दोनों प्रत्यक्षदर्शी हैं

इस सत्य के-

कि विनाश और सृजन;

मृत्यु और जीवन,

दोनों..,

एक दूसरे के समानांतर चलते हैं।

 


तारीख: 12.09.2020                                                        अंकित कुमार भगत






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