नदी का विसर्जन

नदी जब मरती है 
तो उसके साथ मरते हैं
जल शैवाल और मछलियाँ !
साथ ही मरते हैं किनारे, 
जो साक्षी रहे थे अनगिनत मुलाकातों
विदाओं और स्वागतों के !
पतवार की मौत भी 
नदी के साथ ही हो जाती है!
बचता है केवल माझी जो ताउम्र 
मरी हुई नदी की अस्थियाँ 
संग्रह  करने में जीवन व्यतीत करता है 
और अपनी अाखिरी साँस तक 
उन्हें विसर्जित करने 
किसी और जीवित नदी के पास जाने से 
हृदय में होेने वाले संताप 
और पीड़ा सहने का साहस नहीं जुटा पाता !
प्रेम में कितने प्रेमी भला मांझी हो पाते हैं !


तारीख: 09.07.2021                                                        सुजाता






नीचे कमेंट करके रचनाकर को प्रोत्साहित कीजिये, आपका प्रोत्साहन ही लेखक की असली सफलता है