फिर नीड़ से

फिर नीड़ से उड़ी वह चिड़ियाँ
उत्साह के स्वप्निल पंख फैला।
कह मलयानिल से करुण कहानी
अंचल में भर व्यथा दृग पानी।

निर्माण निर्वाण का रहस्य बुझने
वेदना, विरह -वियोग की सहने।
नव अंतरिक्ष के भेद समझने
उद्गार हृदय के अनंत कहने।

नश्वर संसार के शाश्वत अंकुर
चली देखने जग जीवन भंगुर।
घोर माया का वृहद वितान
सुख - दुख मर्म गुणों की खान।

अवनी को कर शत शत प्रणाम
सरस परों में ले संपूर्ण ब्रह्मांड।
अकल्पित चिंतन के तरुण मधुमास
सीखने उदास मन के हास परिहास।
 


तारीख: 01.07.2024                                    वंदना अग्रवाल निराली









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