प्रभात बेला

 

सूरज की लालीमा से आकाश हुआ लाल है,

शीतल समीर का अहसास बेमिसाल है ।

 

चहचहा रही चिड़ियाँ कह रही है सुप्रभात,

होनेवाली है सुबह विदा ले रही है रात ।

 

बिखरे पड़े हैं मोती हरी-हरी घास पर,

गूँज रहा मंदिरों में घंटी का मधुर स्वर ।

 

प्रकृति की छवि का अद्भुत नजारा है,

खिल गई है कलियाँ उपवन कितना प्यारा है।

 

'अमृत-बेला' में जो जाग जाता है,

विद्या,बुद्धि व स्मरण शक्ति पाता है।

 

प्रातःकाल उठता करता है योग,

उसका शरीर सदा रहता निरोग ।

 

नव-प्रभात जीवन में नव-ऊर्जा भरता है,

बिना कठिन श्रम के जीवन कहाँ संवरता है।

 

जागो 'प्रभात बेला' में तोड़ो आलस्य के घेरे,

हरि-स्मरण करो उठकर सुबह-सबेरे ।


तारीख: 12.09.2020                                                        राजीव रंजन






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