सफ़र का ये पड़ाव आखिरी

सफ़र का ये पड़ाव आखिरी,

छोड़ रहा कई किस्सों को,

एक वो किस्सा जिसमे हम हैं,
एक वो किस्सा जिससे हम हैं,

एक वो कहानी भी छूट रही है,
जिसमे साथ होने का भ्रम है,

एक वो उलझा जीवन है,
जिसमे रमे मैं और तुम हैं,

एक वो सुलझा सा पल है,
जिसमे खाली मैं और तुम हैं,

एक वो अनकही बात कहीं है,
जिसमे 'अपनी' बात कहीं है,

एक वो शायद वक़्त नही है,
फुर्सत जिसकी हमे नही है,

एक वो सपना भी बेईमान,
जो हमने देखा कभी है,

एक ये सफर आगे अनजान,
जिसमे दरिया खूब बड़ा है,

और मांझी कोई साथ नही है।


तारीख: 20.05.2020                                                        अंकित मिश्रा






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