समय की डाल पर बैठे

समय की
डाल पर बैठे
सन्नाटे के सुए।

कोलाहल अभिशप्त
हो गया है।
जीवन गहरी नींद
सो गया है।।

महल वैभवशाली है
झुग्गी को-
घृणा छुए।

दफ्तर टेढ़ी चाल
चल रहे हैं।
सपने मोम जैसे
गल रहे हैं।।

कैसी आजादी कि
हजारों-
अग्निदाह हुए।

गाँव सदा
एकाकी जीते हैं।
इच्छाओं के सब-
घट रीते हैं।।

महानगर के
खेल होंगे
भोग-विलास-जुए।


तारीख: 15.07.2020                                                        अविनाश ब्यौहार






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