स्थायित्व

बदलती तकनीकें,

भागती जिंदगी..,

खत्म होता बचपन

और छिपता अल्हड़पन

समझदारी के आगोश में,

बदला है बहुत कुछ इस दरम्यान,

फिर भी कुछ है

जो रहता अपरिवर्तित;

'इस दौर' से 'उस दौर' तक।

 

मार्च की दुपहरिया में

हवाओं की बेरुखी,

फूले हुए सरसों 'औ'

आम्र-मंजरिओं के बीच

एकाध-सूखे-झड़ते पत्ते

अभी नहीं बदले।

परीक्षाओं के बाद होने वाली

मस्ती के स्वर,

मन के किसी कोने में

पल रहे हैं अब भी।

 

 जाने-पहचाने रास्तों पर

अनजान चाह...

मुलाकातों की,

नीले पीले आकाश वाले

ढलते सूरज की पृष्ठभूमि में-

उलट-पुलट कर चासनी बनाने वाले

मन के आवेगों की-

झरोखे बासंती बयारों के,

पुरानी गली और

नई सड़क के पास

मकान पुराना-सा,

बूढ़े बरगद की ओट लिए

है 'यथावत' अब भी।

पुख्ता करता इस बयान को

कि "यादें कभी नहीं मरतीं।"

 

जानता हूँ!

बताया जा चुका है सैकड़ों बार;

"परिवर्तन ही नियम है शाश्वत"

पर मेरा जिद्दी मन

'स्थायित्व' की डोर पकड़;

उड़ना चाहता है

आज भी,

उस पतंग के साथ

जो मेरे आँगन की नीम पर

उलझा था 'कल'।

 

kids


तारीख: 02.10.2020                                                        अंकित कुमार भगत






नीचे कमेंट करके रचनाकर को प्रोत्साहित कीजिये, आपका प्रोत्साहन ही लेखक की असली सफलता है