तुम्हारी हँसी

 

लाख गहने पहन लो
चाहे जाओ हज़ारों बार
ब्यूटी पार्लर
पड़ जाते हैं फीके
सारे सौंदर्य प्रसाधन
जब तुम 'हँसती हो'

हँसी तुम्हारी
खिलते पलाश के
फूल जैसी लगती है
और पलाश को
कहते हैं लोग
'जंगल की आग'!

हाँ,
तुम्हारी हँसी
शेफाली या गुलाब जैसी
नहीं लगती मुझे।
जो स्वर्ग से लाई गई हो
या जिसे छोटे से बाग के
एक गमले तक
कर दिया गया हो सीमित।
जिसे काट छाँट कर तो
दी जाती है कृत्रिम सुंदरता
पर अपने तनों के
विस्तार की छूट नहीं दी जाती
न ही तुम्हारी हँसी
मुझे दिव्य लगती है
न ही अलौकिक।

तुम हँसती हो जब
छोटे अर्द्धचन्द्राकार लबों से
तो लगता है
खिल रहे हैं,
फूल टेसू के।
जिसका विस्तार होता है
पूरा जंगल...
जो होता है लौकिक
एकदम ख़ालिस गँवई।
जिसके फूलों से लोग
बना लेते हैं रंग होली के
पत्तों से जिसके
बनता है पत्तल और दोने
जिसके जड़ के रेशों से
बना लेते हैं गाँव वाले
रस्सियाँ और दरियाँ।
काम आते हैं
जिसके छाले और तने
गोंद और अंततः
कोयला बनाने के।

पत्तियाँ ज़रूरी है
फूलों की परवरिश के लिए
पर पलाश का फूल खिलता है
पत्तियों के झड़ जाने के बाद भी!
वैसे ही
जब तुम मुस्कुराती हो
उन दकियानूसी रूढ़ियों को
ठोकर मारकर भी
जिसे लोग 'परम्परा' कहते हैं
तो लगती हो मुझे
इन पलाश के फूलों जैसी।
बेहद ख़ूबसूरत,
आत्मनिर्भर,
नयनाभिरामी,
एकदम सहज,
सरल और प्यारी।

 


तारीख: 30.05.2020                                                        तारांश






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