उम्मीद

 

कि जब तुम बात हवा की करते हो
तो मैं गीत पुराने गाता हूं
मन ही मन मुस्का के कुछ सारे गम भुलाता हूं


तुम दोष हवा का देते हो मैं निर्दोष उसको पाता हूं

गौरैयों के चहचहाहट वाले ज़माने से मैं आता हूं


क्या दिन रात क्या सांझ सवेरा बस नज़रे यूं ही चुराता हूं
सूने से उस आगन को अब झूठी आस दिलाता हूं।।


कि तुम धुंध घनेरी से डरते हो और मैं कुछ बेरंगा उसको पाता हूं
बैठो कभी तो पास मेरे तितलियों का किस्सा सुनाता हूं
बड़ी गहरी थी यारी अपनी अब बस यादों को भुनाता हूं
फूलों के बागियों में फिर भी हर रोज़ उन्हें खोज आता हूं।।


कि तुम मैली गंगा को कहते हो मैं मैला मन धो आता हूं
तुम छूने से कतराते हो और मैं अंजुरी भर पी जाता हूं।।


कि तुम दोषारोपण करते हो,आओ मैं दोष तुम्हे गिनता हूं
मिले कहीं खुशियों का पता तो वो दिन पुराने ले आता हूं।।


माना अब तक बड़ी भूल हुई पर अब सचेत कर जाता हूं
आधुनिकता से जकड़े ए वीर मैं तुमसे उम्मीद बड़ी लगाता हूं।।
 


तारीख: 24.05.2020                                                        रुद्रस्तक पांडे






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