उन्मुक्तता और प्रेम

जिन पर्वत श्रृंखलाओं को

निहारा करती हो तुम,

अपने छत की ऊँचाई से!

वही पहाड़-

रोकते हैं मेरा दृष्टिपथ।

हमारे गुणों के सुमेलन में

उभयनिष्ठ हैं

कुछ पर्वत शिखर।

 

इसलिए हमारे प्रेम को मिली

आसमान की ऊँचाई,

जहाँ उड़ते-

रुई के फाहों को

अक्सर चूम लेती हो तुम।

फिर उनकी प्रतिच्छाया में

उमग उठता है-'मन मेरा'!

 

मेरे आश्चर्य का

पुनः-पुनः

परिसीमन करती तुम!

खाली सड़क पर चलते वक्त

अक्सर धर लेती हो

रूप-हरे समंदर का,

और मेरा प्रेम;

उनके ऊपर उड़ते

छोटे पंछी जितना उन्मुक्त हो जाता है।

 


तारीख: 12.09.2020                                                        अंकित कुमार भगत






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