उर्मिल व्यथा कथा

करती जगती सम्मुख

विरह वेदना विमोचन ।

प्राक्कथन के पूर्व ही

भीगे उर अंचल लोचन।।

 

जगती रहती निशि वासर

अभिशप्त दीपशिखा सी।

कहती निज नयनों से

अपनी व्यथा कथा सी।।

 

अवनि अंचल पर बिखरी

जल कण करुणा सोती ।

अपने पद पंकज से तुम

कुचल रहे दृग मोती।।

 

निद्रा मग्न जल थल सब

निस्तब्धता  छाई हर ओर।।

मेरे मन का क्रंदन बिगुल

मुखरित होता सब ओर।।

 

 

आंखों से रही बरसती

मेरे दुख की बदली।

तुम रहे विहंसते निष्ठुर

रख मुख पर अंजुलि।।

 

मेरा अंतस बेध रहे हैं

प्रथम प्रणय के बाण।

न जीती न मरती हूं

नहीं निकलते मेरे प्राण।।

 

मधुर मिलन के उन क्षणों की

निष्ठुर तेरी याद सताती।

बैठी अवगुंठन कर

अश्रुबिंदु अखियां बरसाती।।

 

मेरे सब सुख तेरे अनुरागी

नहीं रहा अब कुछ शेष।

शोक वेदना विरह व्यथा

भगन हृदय है अवशेष।।

 

शांत सिंधु में लहर उठी

स्मृति का उद्वेग हुआ।

विछिप्त व्याकुलता व्याप्त हुई

अश्रु का आवेग हुआ।।

 

जग की करुणा अंचल में

बैठी है सिमटी सिमटी।

बाहर भीतर तम ही तम

स्मृति रेखा है निखरी।।

 

तुम हुए हो वनवासी

होता नहीं मधुर संगम।

विरह वीथियों में गुंजित

सिसकती प्रणय सरगम।।

 

दूर पग ध्वनि मंद हुई

सुख का सूर्य अस्त हुआ।

मेरा मानस मनोज

शोक से संतप्त हुआ।।

 

तेरी धड़कन से होता

मन लहरों का स्पंदन।

दूर हुई पग ध्वनि तेरी

मन करता करुणा क्रंदन।।

 

बंद मुष्ठिका में सुख दुख

मन बहलाने की बातें।

मेरा सुख दुख तुम हो

वो जग की थोथी बातें।।

 

नीलांबर से गागर छलकी

रक्तिम हुई दिशाएं।

मेरे भग्न हृदय से

जैसे बह गई आशाएं।।

 

तुम तो लेकर चले गए

मेरे जीवन का पराग।

सूने सूने निशि वासर

लगी अभी भी मन में आग।।

 

भ्रम छवि मिट जाने को

बंद पलक ना खोली।

खंडित दिवा स्वप्न हुआ

करुणा बह दृग से बोली।।

 

द्वार खुले हैं मन के

पलक नहीं झपकाए।

चौंक चौंक उठती

तुम आए, अब आए।।

 

क्यों मेरे भोले मन को

ऐसे तुम छल जाते हो?

देकर मुझको विरह व्यथा

क्या तुम सुख पाते हो?

 

आंखों में सोया सागर

स्थिर शांत निशब्द सा।

तेरा प्रतिबिंब तरंगित

गगन कुसुम अलव्ध सा।।

 

पलक खोलते तुम जाते

आते हो बस स्वप्नों में।

द्वंद्व युद्ध छिड़ जाता

चेतन अवचेतन में।।

 

स्मृति अंचल से मुख ढांपे

सुप्त स्मृतियां पड़ी हुई।

सुस्मृतिया विस्मृत तो

श्रावण की झड़ी हुई।।

 

हा! वेदना वनिता सी

मेरी जीवन सहचरी रही।

रजनी की नीरवता में

नीरज नैनों में भरी रही।।

 

कंपित लौ दीपक की

मेरी सूखी काया सी।

स्मृतियों में शेष रही

मधु मिलन छाया सी।।

 

हृदय व्योम की बदली

दर्द दमिनी दमकी।

मेरे मन के दर्पण में

तेरी छवि चमकी।।

 

असीम अम्बर, अखिल अवनि

से अधिक आयतन दुख का।

कोने कोने ढूंढ़ रही

नहीं कहीं सुख था।।

 

अवचेतन में आते

चेतन में जाते हो।

क्षण भर में ही प्रिय

मधु मय जग कर जाते हो।।

 

स्वप्नों में होता संगम

तुम रहते सीमा रेखा में।

बस इतना ही सुख साथी

अपनी किस्मत रेखा में।।

 

अधरों पर अंकित

विगत रात्रि इतिहास।

आया था हरित भरित

मधुर मिलन मधुमास।।

 

व्यथा वितान तान मन पर

बरसी घनघोर घटाएं।

अंतस में गहरी पैठी

स्मृति वट वृक्ष जटाएं।।

 

हृदय छलक जाता है

देख तेरी निश्ठुरता।

ओ प्रस्तर प्रतिमा से

प्रियतम बढ़ जाती आकुलता।।

 

ओ प्रिए वनवासी

हृद की बात न जानी।

निर्झर नैनों से बहता

तुमने मेरी बात न मानी।।

 

मुझको तुम ले चलते, वन में

रहती तेरी बन अनुचरी।

धर्म यही कहता मुझसे

मैं तेरी हूं सहचरी।।

 

राजमहल के सुख सारे

मुझको दंशित करते।

निराश्रित सी रहूं अकेले

यही विचार प्रकंपित करते।।

 

जग में नाम तुम्हारा होगा

मैं तो बिसराई जाऊंगी।

फिर भी करुणा के कण कण में

मैं पाई जाऊंगी।।

 

जाओ जाओ प्रिए तुम जाओ

मैं जी लूंगी, हां जी लूंगी।

अपने दुःस्वप्नों संग

आंसू सब मैं पी लूंगी।।

 

किसने खोया किसने पाया

कौन किससे दूर हुआ।

सबके साथी सबके साथ

अपना मिलन मजबूर हुआ।।

 

मेरी व्याकुलता न जाना

मैं ही सबसे अलग हुई।

सबके संग सबकी प्रिय हैं

मैं ही तुमसे दूर हुई।।

 

युग युग याद करेगा तुमको

तुम अतुलनीय भ्राता।

पर तुम बिन करूं मैं क्या

तुम ही मेरे त्राता।।

 

जीवन भर हम साथ रहेंगे

कैसा स्वप्न दिखाया तुमने।

कटेंगे कैसे बरस ये चौदह

न अब तक बतलाया तुमने।।

 

पर मेरी तुम बात न समझे

कष्ट मुझे ही महा मिले।

मुझ विरहन जैसा दुख

किसको कितने कहां मिले।।

 

संग मुझे भी ले चलते तो

क्या मैं बनती बाधा?

मिलकर हम करते सेवा

बांट सभी कुछ आधा आधा।।

 

उर्मिल व्यथा कथा तो कोई

जग में समझ न पाया।

राम जानकी की गाथा को

सारे जग ने गाया।।


तारीख: 25.08.2020                                                        मधुबाला श्रीवास्तव






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