युद्ध की विभिषिका

 

Yuddh ki vibhishika kavita

गिरी के भीषण भार से, भयभीत ना संहार से, मैं तब भी था, मैं अब भी हूँ, मैं समर हूँ डिगता नहीं ।

 

मैं ऊर्ध्व हूँ, मैं मूल हूँ, अज्ञानता की भूल हूँ ।

मैं घना अंधकार हूँ, बढ़ता हुआ संहार हूँ ।।

सीता के अपहरण में हूँ, द्रौपदी के चीरहरण में हूँ ।

अर्जुन के अमोघ प्रण में हूँ, कुरुक्षेत्र के हर रण में हूँ ।।

 

शुंभ मैं, निशुंभ मैं, शिव का धधकता लिंग मैं ।

मैं हार में, संहार में, मैं हर तरफ हाहाकार में ।।

बालि का अतुलित बल हूँ मैं, शकुनि का बढ़ता छल हूँ मैं ।

अनुराग में मैं द्वेष हूँ, साधू बना लंकेश हूँ ।।

 

मंदोदरी के करुण विलाप में, गांधारी के प्रलाप में ।

मैं दिन में हूँ, मैं रात में, मैं अट्टहास विलाप में ।।

चाणक्य के अपमान में, द्रौपदी के लुटते मान में ।

निर्धन की बढ़ती कुण्ठा में, गांडीव की चढ़ती प्रत्यंचा में ।

मैं तब भी था, मैं अब भी हूँ, मैं समर हूँ डिगता नहीं ।।

 

प्रस्तुत सदा हर युद्ध में, वीरों के घटते बुद्ध में ।

मैं भोग में, मैं विलास में, मानव तेरे इतिहास में ।।

मारीच की मैं मरीचिका, विध्वंश की मैं विभिषिका ।

अशोभनीय मैं शोक हूँ, कलिंग में लड़ता अशोक हूँ ।

अविराम हूँ, मैं अनन्त हूँ, मानव का बढ़ता अन्त हूँ ।

मैं तब भी था, मैं अब भी हूँ, मैं समर हूँ डिगता नहीं ।।

कुरुक्षेत्र का जब रण सजा, अट्टहास कर मैं हँसा ।

निर्बुद्ध है ना जानते, अपने-अपनों को न मानते ।

रणबांकुरे तन के खड़े, अपने-अपनों से ही लड़े ।

चहुमुख भयंकर शोर था, गांडीव का वो जोर था ।

कटते हुए नर शीश थे, ईश्वर भी कुछ भयभीत थे । 

हैरान मैं हॅसता रहा, कुछ हो रहा यूँ युद्ध था ।

वीरों के प्रज्वलित तेज से, छुपता हुआ नभ सूर्य था ।।

 

है असत्य की मैं रोया नहीं, अपनों को मैंने खोया नहीं ।

अभिमन्यु के संहार पर, द्रौपदी के लुटते न्यार पर ।

रोया मैं सिसकी मार के, जग में बढ़े संहार पर ।।

थी खोज मेरी अमरता, भगवान सा मैं बन चला ।

मानव ठहर क्या कर रहा, भगवान मुझको ना बना ।।

 

अब थक गया इस शोर से, मैं चाहता हूँ अब बूझुँ ।

स्वाहा रूके, निर्भय पले, मन से ना कोई कठोर हो ।

पर जोर है कुछ अनभला, वो सींचता जलती शिखा ।

है उसके मन का अडिग स्वर, वो चाहता है मैं जीऊँ ।।

 

युद्ध के इस भोग से, ईश्वर मुझे अब मुक्ति दे । 

अस्तित्व मेरा ना रहे, वरदान दे, वो शक्ति दे । 

हे दीनबन्धु, हे नीति-निधान, धरती मांगे है अभयदान ।

धरती करुणा की प्यासी है, भागीरथ की अभिलाषी है ।

चछु के पट अब खोलो तुम, हे नीलकंठ कुछ बोलो तुम ।

हे गलमुण्ड घट-घटवासी, हे निर्विकार, हे अविनाशी ।

जग का अंधियारा दूर करो, हे पूण्य प्रकाश, हे हिमवाशी ।।


तारीख: 21.07.2020                                                        अजीत कुमार सिंह






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