भाभी आप ही मेरे भाई हो

अरे, रमा, ये राखी की थाली क्यों सजा रही हो? राकेश बेटा, तो विदेश में है, तूने अभी तक उसकी राखी नहीं भिजवाई? रमा की माँ, उत्सुकतावश, अपनी बेटी से पूछती है.

महक बहू कहाँ हो? तुमने अभी तक रमा की राखी पोस्ट क्यों नहीं की? राजेश कितना इंतज़ार कर रहा होगा?

माँ, भैया, अब मेरी राखी का इंतज़ार नहीं करते. तीन साल हो गए, आज तक कभी फोन या कोई संदेसा भेजा है. दो महीने पहले अपनी इकलौती बहन की शादी में भी शामिल नहीं हुए.

रमा रुआंसी होते हुए बोली. अरे, शादी में शामिल नहीं हुआ तो क्या? कितना काम करता है, कितना बिजी रहता है, मेरा बेटा... और दो साल, तेरी पढ़ाई का खर्चा, तेरी शादी का खर्चा, कपडे, सोने के गहने, सभी का तो इंतज़ाम किया और तू उससे गुस्सा हो रही है.

माँ, रमा को उलाहना देती हुए बोली.

महक भाभी.... ये राखी की थाली आपके लिए है. आज से "आप ही मेरे भाई" हो और रमा रोते हुए भाभी को गले लगा लेती है. भाभी, इन अश्कों को आज बहने दो. कब से इस दर्द को अपने सीने में छुपाये बैठी हो? भैया की गलती पर, कब तक, पर्दा डालोगी .... हाँ, भाभी मुझे सब पता चल गया है.

दो दिन पहले जब मैंने आपको, अपनी राखी, भैया को पोस्ट करने के लिए दी, तो मैंने देखा, आपने एक बॉक्स में वो राखी रख दी. मैंने आपसे राखी के बारे में पूछा तो अपने कहा की आपने वो पोस्ट कर दी, लेकिन मेरे मन में कुछ खटक रहा था. आपके स्कूल जाने के बाद मैंने आपकी अलमारी में से वो बॉक्स खोल कर देखा तो मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई ... बॉक्स में पिछले तीन सालों की राखियां और एक कागज़ का टुकड़ा था, जिस पर भैया की हैंड राइटिंग में दो तीन लाइनों में लिखा था - "महक, मैं विदेश तो जा रहा हूँ लेकिन कभी वापिस नहीं आऊंगा. मुझसे घर की ज़िम्मेदारी नहीं संभालती अभी छोटी की शादी और बहुत ज़िम्मेदारियाँ है. तुम आज़ाद हो. मेरा इंतज़ार मत करना."

माँ-बाबूजी, भैया के लिए हम सब, एक बोझ हैं. वो सिर्फ खुद के लिए जीना चाहते है. भाभी भी उनके लिए कोई मायने नहीं रखती, इसलिए स्पष्ट रूप में कह दिया, की वे 'आज़ाद' है.

लेकिन, भाभी खुदगर्ज़ नही, इतना हो जाने पर भी, खुद अकेली, इस राज़ को अपने अंदर दबाये रखा. मेरी पढ़ाई, घर का खर्चा अप्प दोनों की दवाइयां, मकान का किराया, सब अकेले अपने दम पर करती रही और यही दिखती रही की ये पैसा भैया ने भेजा है. यहाँ तक मेरी शादी के लिए इन्होने लोन लिया, अपने सारे गहने मुझे दे दिए, लेकिन भैया पर आंच नहीं आने दी. झूठ-मूठ का, भैया से, फोन पर बात करना और अपने ही हाथ से पत्र लिखकर, हमारा हाल पूछना, कितना दुःख होता होगा... भाभी को ये सब करने पर, लेकिन, उन्होंने कभी जताया ही नहीं, हमेशा मुस्कुराते हुए हमारा ख्याल रखा.

माँ, भैया ने, ना तो बेटे का, ना भाई का और ना ही पति का फ़र्ज़ निभाया. लेकिन भाभी, भाभी ने, पराई होकर भी अपनों सा प्यार दिया और बहु होने के साथ-साथ, बेटे और भाई का फ़र्ज़ भी निभाया.

भाभी, आप ही मेरे भाई हो... आपने, भाई से बढ़कर मुझे प्यार, मान-सम्मान दिया, मेरी रक्षा करि, कदम कदम पर मेरा साथ दिया, हर मुश्किल से बाहर निकाला, भाई का हर फ़र्ज़ निभाया.

रमा ने आगे बढ़कर, महक को तिलक लगाया और उसकी कलाई पर राखी बाँधी. दोनों गले लगकर खूब रोये. भाभी मेरा "गिफ्ट" ... महक ने कहा, जो तुम चाहो, मांग लो. भाभी, मैं आपसे, एक "वादा" माँगना चाहती हूँ, मैं चाहती हूँ के आप दूसरी शादी कर लें... महक हैरत भरी नज़रों से देखने लगती है. हाँ भाभी, आज इस बहन को भी अपना फ़र्ज़ पूरा करने दो... प्लीज् भाभी ना मत करना... हाँ महक तुम हमारी बहु नहीं बेटी हो, हम तुम्हारा कन्यादान करेंगे. माँ-पिताजी ने आशीर्वाद देते हुए कहा...

और रमा ने अपने भाईरूपी भाभी को गले लगा लिया.


तारीख: 25.08.2021                                                        मंजरी शर्मा






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